आश्रम की बहनो को बापू के पत्र | Bapuke Patra, Ashram ki Bahano ko

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Book Image : आश्रम की बहनो को बापू के पत्र - Bapuke Patra, Ashram ki Bahano ko

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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र्षा मौनवा८ ६-१२-२६ बहनों मेरे बचनके प्रनुसार सुबह भाप्ता गरके पहला काम शुम्हें पत्र लिपनंका कर रहा है । भमी सात अजनमें पांच मिनट मी हु । भिसत्निमे तुम सब भभी तो प्रापना-मदिरमें भा रही होगी । जो समप स्मो भुमका पान करना । जिसने हाजिर होना मंजूर किया ट षद्‌ भागस्िक्‌ पटनाके सिका हाजिर होती होमी । मम तो रमणीकृासको गीताजोके अक-दो पमो हमेशा कशानगी भूबना दी है । परतु तुम भपनी मिच्छाव मनुमार वापम शुरू कराना । सिगनका मम्पाम कमी न छोषटना । मधर हमा मुषार्ना । मधर यद्‌ म पमे मही पर्म-पालनम मापन-न्प हु । पर्मषौ स्मास्यातो हम जो दनोक रोज पाठ किया करते थे मुनम है । मोर हम तो पर्म-पालत सीसना है। पम परोपवारस है । परोपडार मागी दूसरेवा मसला चाहता भौर बरसा ट्रसरेगो संदा भरना । सिम पदक आारम कण्ते हुम तुम भेग-दसरेके साथ सगों बतनता-सा र्लहू रंसता सफर टुसम सब दुर्सी होना । यह तो बच ही बात हुमी । मुझ पद तो हर हले शान हे जिगगिम जद पटने अपना पायय बन होने दूं । 1




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