विश्वभारती पत्रिका | Vishva Bharti Patrika

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Vishva Bharti Patrika  by रामसिंह तोमर - Ramsingh Tomar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१९ विश्वभारती पञ्चिका व्यक्तिगत कल्याण तक से ही सम्बद्ध रहता है वहां द्वितीय का वंध समष्टिगत कल्याण तक पहु च ला सकता है । इसी प्रकार भ'तिम अर्थात्‌ तृतीय के लिए कहां जा सकता है कि उसकी स्थिति मै, को साधक वाहा षा सांसारिक क्षेत्र से ऊपर उठकर भात्मानुभूति की उस उन्चतम दशा को भी प्राप कर ठे सकता है जिसे जेनधमे के अनुसार प्रम अमी समां जाता है। इस धर्म केक्षेत्र में नेतिकता एव विचारगत वदारता को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया लाता है तथा इसके छिए यहाँ कठोर नियम भी प्रचलित है जिस कारण विषति अनुशासन को भंग करने अ यषां पर “बिदवव कहलाकर प्राय वढ़्िष्कृत सी किये जा सकते हैं ।९ इस प्रकार किसी जेनधर्मी सिद्ध के छिए कहा जा सकता है कि बह अपनी उपयुक्त प्रथम अर्थात्‌ व्यक्तिगत ठल्क्ष वाली दा में भी, कमी कोई ऐसा छाये करना पद्‌ नही कर सकता जिते शीः के पिस कहालासके। पर तु जेन मंत्रवाद के ही प्रथ “श्री भैरव पद्मावती कल्प” के देखने से पता लता है कि उसका एक बहुत बड़ा अंश निम्नकोटि की भाकक्षाओं की तृप्ति से संबद्ध है। उदादरण के लिए उसके पांचवे 'अधिकार' ( भध्याय ' के अतर्गत किसी दूसरे की गति पु कर देने, छठे में स्त्रियों को आकृष्ट करके उन्हें प्रभावित करने, सातवे में दूसरों को अपने बश मैं छाने, नौवे में विविघ भौषधियों के प्रयोग द्वारा चकित वा स्तंभित कर देने जैसी सिद्धियों के प्राप्त कर सकने की चर्चा की राई है,१० जिन्हें हम उपयुक्त जादूगरों वाली सफछता से उच्वतर कोटि की नहो ठहरा सकते । शसम सन्देह नदं कि वहां पर मी दम कहौ मय, मांस, मीन, मुद्दा एव मैथुन बाले यत्र 'म' कारों को अपनाने जैसा कोई स्पष्ट विधान लक्षित नहीं होता, कितु जिन सित्रयों के ऊपर विजय प्राप्त कर लेने के प्रमंग यहाँ भाते हैं वे तो, कम से कम दूसरों की पत्नियां तक भी दो सकती हैं । अतएव इसका समाधान केवल इस रृष्टि के अनुसार हो किया जा सकता है, कि जिस काल ( अर्थात्‌ ११ वीं इंस्वी शताब्दी के अतमेत उक्त प्रथ का रचनाकाल समसा जाता है, उस समय तक तांत्रिक प्रभाव बहुत अधिक बढ़ चुका था गौर वैसी बातों फो मदत प्रदान करना उन दिनों उतना अनैतिक नही माना जाता रहा होगा । बोगशास्त्र के द्वारा प्रतिपादित सिद्धियों को उपलब्ध करने के साधनों का उल्लेख हम इसके पटले कर भये ह । हमने भश पर यद मी देखा है कि उनमें से कम से कम दो अर्थात, ९, एमू० बी० सावेरी कम्पेरेि एंड किटिकल स्टडील़ भाफ मन्त्रशास्त ( महमदाबाद सन्‌ १९.४४ ६० ) प° १४७ भौर्‌ २९३-४। १०, दे° धृ ए० २४९ ३०-५, ३३-४४, ५३-६१ भादि ।




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