घनश्यामगीता | Ghanshyam Geeta

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Ghanshyam Geeta by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ड) “ग्रथ्नामि स्वमनोयोगात्‌ लोकेकहित काम्यया॥ १।१०॥ का पणं तरह निर्वहण कर चुका है, पाणिडित्य प्रदर्शन का लोभ उसे अपने पथ से ्रष्ट नद्य कर सका है । अत्यन्त गहन विषयों को स्वै साधारण सुलभ कर देने की शैली दश्च॑नीय ह! अणी मनसे ही वन्धनमे पड़ता है' तथा उसी से वन्धन से छूटता भी है इसके लिए कितना खुन्दर और सरल उदाहरण है-- भूमिमेवाबलम्भ्येव यथोत्तिष्ठति भूगतः | अवद्ध मनसा प्राणी वेनैवोरथाप्यते पुनः ॥ १२।१०२॥ दौड़ते २ या चलते २ भूमि पर गिर पड़ने वाला व्यक्ति आकाश को नहीं तकता है अपितु उसी भूमि का सहारा लेकर उठा करता है इसी प्रकार मन से बंधा मन से ही छूटता है. । उदाइददरर्णों से “प्रास्ताविकं किश्वित” का विस्तृत कार्य होता जा रहा है अतः यही पर्याप्त होगा । जिस प्रकार इस माला का वाह्यरूप-सङ्गठन या प्रथन अल्यन्त खुन्दर है उसी पकार उसका अन्तर रूप भी | इसमें केवल भर्वी के फूल ही नहीं लिये गये हैं. तथा न ये फूल निर्गन्ध किंशुक की भाँति “वहिरेव मनोदराः” ही हैं। एक २ भाव खम रलो का सा महत्व रखता है । इसमे अन्थकार ने जीवन भर के समस्त अनुभवों के सार को 'संजोया' है । भ्त्येक भाव विना किसी जग्वाल के लोक प्रचलित सीधी सादोी भापा में रखा गया है । मानव जीवन से सम्बन्धित ज्ञान राशि का कोई भाग ऐसा नहीं है जो इससे अछूता वच गया हो। सभी श्रेणियों के सभी अवस्था के व्यक्तियों के लिए प्रात: उठने से सोने तक के समस्त कतेंव्यों ( विधि-निषेधों ) का घामाणिक बरन डैः । किसी एक पद्य को लेकर भी मनुष्य जीवन का आदुशे बना ज्ञे तो मानवज्ञीवन के चरमस्य का प्रत्यक्ष कर




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