जैन कथाओं का सांस्कृतिक अध्ययन | Jain Kathaon Ka Sanskritik Adhyayan

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Jain Kathaon Ka Sanskritik Adhyayan by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हमारे सामने आते है उनका चिन्तन एक एेसा समाज शास्त्रीय दशन प्रस्तुत करता है, जो देश ओर कार क। ५।५।५ से परे हैं । मानव मात्र के लिए है। सारे विश्व के लिये है । भगवान्‌ महावीर के च्चिन्तन का अध्ययन अब इस दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए । विश्व के दाशनिकों के चिन्तन के साथ महावीर के चिन्तन का अध्ययन करके विश्वं कल्याण के लिए महावीर के चिन्तन का अमृत प्रस्तुत करना चाहिए । दूसरी वात वेक्ञानिक सन्दर्भो की है । यह भौर अधिक महत्वपृण है इस विषय मे दौ वाते ध्यान मेँ रखनी होगी । एक यह कि महावीर की प्चीस सौ वर्षो म व्याप प्रम्पराके साहि्यमे जौ वज्ञानिक तथ्य उपलब्ध होते है, उनका अध्ययन किया जाये । दूसरे यह कि संद्धान्तिक मान्यताओं का प्रायोगिक अध्ययन किया जाये । उदाहरण के लिए कुछ विषय ये हैं-- १: लोक की रचना कै विषय मे वातवलय का सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण है । तीन वातवलय इस विश्व के आधार वताये गये रै । अन्तरिक्ष की खोज से वातवलयों की मान्यता थोडी-थोडी समझ मे आ जाती है । इसका पूरा अध्ययन किया जाये तो आन्तरिक्ष यात्रा के नये आयाम खुल सकते है । लोक के स्वरूप कौ जो मूलभूत मान्यता थी; संभवतया वाद के व्याख्या ग्र थो मे वह डूब गयी है । इस कारण हम उसके अध्ययन सूत्र नही पकड पा रहे है ओर हभ लगता है, जेसे ये मान्यतां काल्पनिक रही हो । जब तक इनका सम्यक्‌ परीक्षण न कर लिया, तव तक इनको झुठलाने की बात मेरी समझ मेँ नही आती । २: जीवके विकाश की प्रक्रिया का प्रायोगिक अध्ययन ससार की अनेक शुच्थियों को सुलझा सकता है। डार्बिन ने विकासवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था । हमारे यहाँ निगोद से लेकर मोक्ष तक की विकास प्रक्रिया का विधिवत वर्णन किया है । इसका अध्ययन डार्विन के सिद्धान्त तथा अन्य नवीन खोजो के साथ तुलनात्मक दृष्टि से अपेक्षित है । क्मबन्ध की रासायनिक प्रक्रिया का अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है । स्निग्ध और रुक्ष कर्म पुझ पद्गल्लौ का वन्ध किस प्रकार होता है ? किन परमाणुओं का आख्व होने के वाद भो वन्ध नहीं होता वधे हुए कम परमाणुओ की निजरा किस प्रकार होती है; इत्यादि का अनुसन्धान होने पर कई नये तथ्य उद्घादित होगे । ४: कर्म सिद्धान्त में जो गणितीय सामग्री है; उसमें आधुनिक गणित सिद्धान्त की सबसे जटिल 'सेट्थ्योरी” के समाधान की सामग्री उपलब्ध है । इसका अध्ययन प्रायोगिक रूप में आवश्यक है । इसी प्रकार के अन्य अनेक विषय दै, जिनका अध्ययन प्रायोगिक स्तर पर होना चाहिए । उपयुक्त दोनो प्रकार से अर्थात्‌ समाजशास्त्रीय टष्टिकौण से तथा प्रायोगिक रूप मँ महावीर के चिन्तन का अध्ययन परम्परागत ढंग की पाठशालाओं; विद्यालयों या साहित्यिक अनुसन्धान के लिए स्थापित संस्थानों मे संभव नही है । मानविकी तथा चिन्ञान के निष्णात ओर निष्ठावान्‌ अध्येता तथा सिद्धान्तौ के सच्चे ज्ञाता जब सम्मिलित रूप से इस दिशा मेँ प्रदत्त होगे तभी इस प्रकार के अध्ययन सम्भव है ) मे इस वाते को वर्षों से कहता आ रहा हूँ । आचाय हुलसी जी ने जव जन विश्व भारती की स्थापना की वातत प्रारम्भ की थी तव उनके समक्ष भी मेने यह वात रखी थी । वस्वई में महावीर निर्वाण शताब्दी के लिए ६




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