महावीर क्या थे | Mahaveer Kya The

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महावीर कया थे लोग इन्द्ियतृप्ति को सुख मानते हैं। सुख देन से सुख मिलता है-नयों उनको विचारणा है । भगवान ने बनापा-- जिनमे सुख क्षणिक होता है एन दुख चिर तन मर ज्निका परिणामं सुन्दर नदी होता वे काम माग गौर उनते होने वालो इद्द्रिय-तृति जो अतुन्ति बढ़ाती दे सुख नही दु लव है। यु तो आत्म रमण है । बह परिणाम मे सुन्दर है । उसते अन्त मं विषाद नदीं मिलता, अतुसि मूलक पर्तृप्ति नहीं होती ।” आत्मा का समाधान आत्मा मे है पुदुगल मे नष्टी। अपना समाधान अपने स ही. मिलता है । “पर मे स्व का आरोप था स्व पर का अम समाचान लाने वाला नहीं होता । समाधि का मांग यहो है कि आत्मां जपने ही क्षत्रं मे विचरे। पौदुगलिक पदार्घो मं वंध नहो भास्तक्न न बन । उनका मिन सम्त्रघ। विचार एक गहरी दण्ट देता है, मिन बाहर नही है । जहां स्वार्थ और प्रेम व ढ्वत रइता है. बड्ढा मैत्री आओपचारिक हो सकतो है तात्विक नहीं । एक आदमी का स्वाथे दूसरे के स्वार्थ से अत्यन्त जुड़ा हुआ हो हो नहीं सकता | प्रेम एक को हो द॑ -यह असम्मव जैसो बात है । मित्रता पूरी व प्रिलतो है जहाँ स्वाथ और प्रेम पूरे अमिन बनवर रहते है। मगवात्‌ मंशवीर कौ यह ललित वागी-- पुरिमा तुममेन तुम मित्त पि बहिथा मित्तमिच्दति --मदज हो मनुष्य का ध्मान दीष केनो है। तूही तेरा मिच बाहरकया स्वोजता है ? मित्र वद है जो हितं करे दु ल्न से छुगए.1 उन्होंने बताया-- तू अपने झाप पर कांवू पा अपने कौ जोत फिर घोच्र हो सर्वे दु खो हे छूट जाएगा । प स




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