छूत और अछूत पूर्वार्ध | Chhut Aur Achhut Purvardh

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : छूत और अछूत पूर्वार्ध  - Chhut Aur Achhut Purvardh
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्रीपाद दामोदर सातवळेकर - Shripad Damodar Satwalekar

Add Infomation AboutShripad Damodar Satwalekar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
विकयावन्यास । १५कम अदाद्ध तथा अधिक अदाद मिलकर वास करोड़ हैं । इसका मतलब यही होता है कि सब लोगों की समझ अस्प संख्यावालों की अपेक्षा दोष अजान लोग हीन हैं । यद ज्ञादती हे। यह प्रथा दो हज़ार घर्षों सो बरावर चली आ रही है। इस लिये व श्रेष्ठ जाति और निष्कृष्ट जावि दोनोके नस नस मे मरी हृं हे इस धार्मिक गुलामी का लोगों के मन पर विचित्र परिणाम हुआ हे । उच्च जातियों के साथ समानता के हक्का की भावना तक इन नीची जाति के लोगों में से बिलकुल नष्ट हो गई है । यह बोद्धिक अव- नति । है ओर इसका कारण हे धार्मिक गुलामी इसका विचार आगे. चलकर करेंगे। वतमान समय में समाज में जो छूत अछूत का व्यवहार हे उसके अनसार लोगो के चार विभाग बन सकते हैं ।(१) डिस्सित समाज - इस विभाग में चिशेषत नाकरी करने वाले लोग आते हैं तथा बडेबड़े सरदार जागोरदार ओहदेदार बड़े बड़े व्यापारी बडे बड़े अधिकारी और प्रसिद्ध विद्वान आदि इसमें दामील है ।(२. मध्यम समाज-- इसमे मामूली मुन्शी, दुकानदार, चित्रकारी या उसीके समान किसी कला विशेष का काम करके पेट पालने वाले अल्पदिक्षित लोग धामिल हे ।( ३ ) अशिक्षित समाज- बिटकुल अनपटे ओर मिहनत का काम करके पेट पालनेवाले लोग इसमें शामिल हैं। माली, कुष्ठा, धाबी, किसान आदि च्छोग इसो विभाग मे आते डे ।( ७ ) अस्पृह्य समाज- इसमे दड, चमार, नाम, परया, अंत्यज, डोम, मेहतर मिरासी आदि ज्ञातियां शामिल हैं । इनमें




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now