रवीन्द्र साहित्य भाग 16 | Ravindar Sahitya Bhag 16

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutRAVINDRANATH TAGORE
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
150
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about रवीन्द्रनाथ टैगोर - Ravindranath Tagore
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)धृतराष्ट्र--
गान्धारी--
गान्धासेसा आवेदन : काव्य
कोपो कृपाणे पदी अचल दो सोती रहीं
लुप्त वज़-नि भेपित विदुत-री 1 महाराज,
सुनो मदाराज, मेरी विनय विनम्र आज,
दूर करो जननीकी ज्जा ग्लानि, लजानत
वीरताके धमैका उद्धार करो, मर्माइत
विकल सतीत्वके दो आंसू पो, अवनत
झुचि न्याय-वर्मृकी प्रतिष्ठा करो, तेण - वत्
त्याग दो दुर्योधनको !
पश्चात्ताप - तापसे जो
जजर हदय स्वत, उसपर करती दो
चोट व्यथे, रानी तुम ।
सौ-गुनी क्या मु, नाय,
होती नहीं वेदना दै 2 दण्डितके किन्तु साथ
एकर-सा आघात पाके जव दण्डदाता रोता
तभी, प्रभु, वह सष्वा सर्वेत्करट न्याय दोत्ता ।
पाता नदीं जिसके किए है न्यथा प्राण॒ - मन,
उसे दण्ड देना बलवानका है उत्पीढ़न ।
पुत्रको जो दण्ड-पीडा देनेमें हो असमथ,
वृह किसी-ओौरको न देना कभी भूल व्यथै ।
पुत्र जो ठम्दारा नदी, उसके क्या पिता नही *
मदा-अपराधी होंगे उसके निकट, कहीं
न्यायाधीश उसके जोदोगे1 सुनती दू यद,
विखव-विधाताकी हम सभी दँ सन्तान, वद
नारायण पुत्रोंका विचार करता है स्थिर,
अपने दी हाथों व्यथा देके व्यथा पाता फिर
साथ-साथ, अन्यथा नदीं है अधिकारी वद
न्याय करनेका कमी । मै द्र मूढ नारी, यद्
१६
User Reviews
No Reviews | Add Yours...