मुनिद्वय अजिनंदत ग्रन्थ | Munidvya Ajinandat Granth

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
21 MB
कुल पष्ठ :
362
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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विविह कुलुप्पण्णा कुलुप्पण्णा साहवों कप्परूक्खा
साधू घलली के जगम कन्पवृक्ष
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१
संयोजकीय
राजस्थान की स्थानकवासी जैन-परम्परा मे आचाय श्री
रुघनाथजी एव वाचाये श्रौ जयमलजी दो महान् ज्योतिधर
आचार्यं हृए हँ । दोनो ही वड प्रभावशाली, तपस्वी एव जन श्रुत
वाड मय के गहन अभ्यासी यथे 1 राजस्थान के अधिकाण क्षेत्रो
मे आज इन्ही दो आचार्यो कौ परम्परा काश्रमण परिवार फला
हुआ है ।
आचायें श्री जयमलजी महाराज की परम्परा मे स्वर्गीय
स्वामी श्री जोरावरमलजी महाराज, स्वर्गीय स्वामी श्री हजारी-
मलजी महाराज महान् प्रभावशाली, तेजस्वी एव वचंस्वी सत हुए
ह! माज उनके प्रतिनिधि है--स्वामीजी श्री ब्रजलालजी एव
मुनि श्री मिश्रीमलजी मधुकर 1'
श्री मघुकर मुनिजी जितने विद्वान्, विचारक ह, उतने ही
गहरे शातिप्रिय, आत्मनिष्ड एव निस्पृहवृत्ति के सत हैं । यश
एव कीति की लिप्सा तो उन्हे छ भी नही गयी है, बल्कि कहना
चाहिए वे मान-सम्मान पूजा-प्रतिष्ठा आदि लोकर्षपणाओ से सदा
कतराते-से रहै हँ । उनके ज्येष्ठ गुरुश्राता स्वामी श्री ब्रजलालजी
तो और भी उदासीन-निस्पृहधृत्ति वाले श्रमण है । ऐसे सतो
का “अभिनन्दन-समारोह' एक बडा विचित्र प्रश्न है, और विचित्र
से भी अधिक कठिन !
मुनिद्यय के अनेक श्रद्धालुजनो तथा मुझ जैसे भावनाशील
व्यक्तियो कै अन्तरमन मे एक कल्पना बौ कि मुनिद्य दारा की
गई जिनशास्षन को सेवामो तथा सुदी्धं निर्मल-चारित्र पर्याय के
उपलक्ष्य मे हम उनका सावेजनिक अभिनन्दन करे, एक अभिनन्दन
ग्रन्थ भेंट कर अपनी गहन-स्फूर्त श्रद्धा को कुछ अभिव्यक्ति दें ।
पिन पक तः मः (न = = ~~ -८८
स्रिय शकल दर
ष 2, 4,
धय) ६ रा * उस ५६.
न दव ॥ 1 |
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