अपरनाम भगवती आराधना | Aparnaam Bhagvati Aaradhana

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
31 MB
कुल पष्ठ :
783
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand){ च )विषय पृष्ठ , विषय पृष्ठ | विषय कूच्ठ
कुरील चष्ट मुनि ४७१ | क्रोध कृत दोष जीतने का उपाय ५०१ | तियंचगति के दुख ५४४
यथाछन्द जाति न्रष्ट मुनि ४७३ | मानकृत दोष त ५०३ , देव मनुष्यगति के दुख ५४६
संसरा च ४७४ ¦ मायाजार कृत दोष र ५०४ | करमोदिय जनित वेदना को कोई दूर नही
इन्दियासक्त मुनि भ्रष्ट है ४७५ , लोभ कृतं दोष ५ ५०६, कर सकता ५५२
इन्द्रिय कषाय बिजयी के ज्ञान | निद्रा विजय का उपाय ५०६ | संयमो को मरण भमला पर संयम
कार्यकारी है ४८१ | तप महिमा ५०६ । ना ठीक नहीं ५५३
बाह्य साघुकासा धाचरणस्नीर | शरीर सुख में श्रासक्त के तप में दोष. ५१० | कर्म सबसे बलवान है ५५४
ग्रन्तरंग मलीन कृथा है ४८४ श्रालसीकेतपमें दोष ५१० ¦ श्रसात मे क्लेशित होना उचित नहीं ५५५
बाह्य प्रवृति शुद्धकर भ्रात्माकी शुद्धता ' तपङ्चरण के गुण ५११ ! व्रत भंग पाप है १५७भ्रपेक्षित है ४८४ | निर्यायकाचार्यं के उपदेशा से संस्तर परत्यारूयान का भंग मरण से बुरा है. ५५८श्रम्यन्तर शुद्ध के बाह्य क्रिया नियम प्राप्त साघु प्रसन्न होता है ५१६ , अ्राहार की लंपटता स्वं पाषोंकोसे शुद्ध होगी ४८४ | उपदेश सुन, संस्तर से उठ, गुरू वन्दना कराती है. ५४५४बाह्य शुद्धता भ्रम्यन्तर शुद्धता का भादि किंस प्रकार करे ५१७ | घ्राहार लम्पटी के दुष्टान्त ५६२सूचक है ४८५ ¦ ३ सारणा भचिकार ¦ श्राहार लम्पटी के क्लेश ५६५इन्द्रियासक्त व्यक्तियों के दृष्टान्त ४८६ क्षपक के देने योग्य आहार ५१६ | शरीर.ममस्व त्याग का उपदेश ५६७कों कुत दोष ४८८७ ' क्षपक के वेदना हने पर भ्रन्य सा | ३७ ( शण मी ५७९१का कतव्य ५२० । इष्टानिष्ट में राग ढष नदी करना ५.७२काक तक ५ ए ३५ कवच प्रधिकार ५२४ । समस्त पदार्थों में सम भाव रखना ५७३मायाचार कृत दोष ४९२ , शिथिलता दूर करने हेतुं मीठे वचन साध् की मत्री कारुण्य भदिता एवंमायाचारी कुम्मकार का दृष्टन्तं ४६२. द्वारा साघु को संबोघना ५२५ उपेक्षा भावना का स्वरूप ५७४लोभ कृत दोष | साधु को चलायमान नहीं होना ५२७ | ३७ ध्यान श्रलिकार ५७५
भृगध्वज क दृष्टान्तं ४९४ विभिन्न परिषह सहने वाजे दृष्टान्त ५३१ | क्षपक शुभ ध्यान करता है, अशुभ नहीं »कार्तवीर्यं का दृष्टान्त ४६५ ¦ नरक भे उष्ण वेदना ५३८ | श्रार्त ध्यान के मेद ५७६
सामान्य इन्द्रिय कषाय जनित दोष । नरक में शीत वेदना ५३८ | अनिष्ट सयोगज भ्रार्तध्यानं %द्मीर निराकरण के उपाय ४६५ | नरक के अन्य दुःख ५३८ ' इष्ट-वियोगज ग्रार्त्तध्यान ५७०
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