प्रेमोपहार | premopahar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मेरी श्राशा श्राशा ! कहो क्यों सुफसे रूठ गये ! मुक्त नहीं मादूम था कि तुम सुक्ते इतने ही दिनों में त्याग दोगे। हाय ! सुर्य्य के शत्त होते ही कमल ने श्राँखं मूंद लॉ । प्रकाशे मन्द पढ़ते ही शरन्धक्षार ने श्रधिकार जमा लिया । ससार ! मैं चुर गई. मेय सर्वस्व लिन गया ' यह मेरे दिल का दुकडा है-मेरे हृदय का रख दे-मेरी श्राशा है। इस छाती में रख लूंगी-- श्राँखों में छिपा छूगी । ( बेहोश होकर गिर पढ़ना ) (येन्ला) र +. भोला का मकान ( भोराफे षिवा का षडवडते हुये शाना ) पिता--बेटा | बेटा ! भाग्य का हेठा, किस फा बेटा! कैसा घेरा! मुर्ख बजर वद्टू-जोरु का टट्टू-स्त्री का मुख देखते ही हो गया लट्टू। न पिता का भय, न माता का डर, जोरू पाते ही हो गया निडर | पढ़ने के नाम से सर चकराता है, काम के नाम से बुखार श्राता है । हाय | हाय !! श्राजकल के लड़के ऐसे विगड़ गये कि श्रा चिवाह हुआ श्र कल से श्रांखें सेंकने लगे । प्रेम के




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