ठंडी सड़क | thandi sadak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९६ ठँढी सड़क । कभी-कभी चुल्छ भर पानीमें डूवकर इस जीवन नौकाकों किनारे ङ्गा देता दे । जिस समय फरदाद पद्दाड़ खोद रद्दा था, उसने शीरींके सम्ब- न्यसे ल्याठ किया था कि हाय ! इसका री कठेजा केसा पत्थरका डै। ओर उसी समय उसने यह तय किया था कि-यदि सँ पने इस काममें सफल हो जाऊ'गा तो और कहां-कददां पत्थरके कलेजे ई उनका पता छगाऊ'गा और इन्द्दीं पत्थरोंसे एक प्र म-भवन, वनाकर दुनियामिं सर्वश्रेष्ट आश्नर्यकी सष्टि करूंगा। असख्य जनता तो ्रोम-भवनके दर्शनार्थं अवेगी दही, परन्तु एक दिन ऐसा भी निश्चित कर दू'गा कि श्रोम-भवनः के सामने मेदानमे मेला ङ्गा करेगा । सुमे कते हुयेदुःख दहो ता दै कि फरदाद्‌ पहाड़ खोदनेसे पट्टी इख संसारको छोड़ गया मौर 'प्रेस-भवन” की स्कीम भाइसक्रीममें ही पड़ी रहं गहै । सन्तोष यही ईद कि भव पुनः छोगोंका ध्यान इस ओर गया दै ओर चडे-बड़े शदर्रोमें प्रम क्षेत्र खुर गये हैं । कुछ खास नगरोंके प्र म-ध्षेत्रोंके नाम ये हैं:-- (१) शुक्ला स्ट्री; हाइट स्ट्रीट--वस्वई । (२ ) चावडी चाजार - दिल्डी । (३ ) डिव्वी बाजार--खाहौर । (४ ) फुछट्टी बाजार--आागरा । ( ५ ) चौक बाजार--छखनऊ | ($ ) दार्मण्डी-वनारस।




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