भरतोध्दारिणी | Bharatoddharini
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
126
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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इदं प्रथमे दिव्य षष्टी सूय्य छोकादिक तथा।
पाता वायु अग्नि जर आकाश पृथिवी सर्वथा ॥
चन्द्रादि अ्रहद तारे नक्षत्रादिक जहां तक देखते।
चुद्दादि मंगल ग्रह तथा आधार-पृथ्वी छेखते ॥४०॥
निज शक्ति रूपी चीज से प्रभु! सुष्टि अंडेका किये।
रयि कान्तिवत; उस पिन्ड में, बखि-वर्ष तब खन्डन किये ॥
स्वर्णादि भूतल, तल सुतल सव भंड के दी मध्य में |
वितलादि अह पातारु जग, उत्पन किये तेहि मध्य मे ॥४१॥
स्वगोदि लोकों को रवे उस अन्ड के .मपरांश में ।
पृथ्वी तथा पाताल की रचना किये दोपांश में ॥
क्षितिजादि अख आकाश की सी मह मध्यांश में
सागर ससुद्रादिक रचे, प्रभु ! ष्टि के निम्नांश में ॥४२॥
यह चन्द्रमा मन से तथा रवि तेज से उत्पन हुआ ।
भ्राण-वत-लामर्थं से यह पवन का वितरण हुआ |
सुख से प्रगट अग्नी तथां सामथं से संसोर यह ।
सवख का विशु | मूल दैः वहि ईश ! जो भरमार यहं ॥४१॥
गोस्वामी सृष्टि ।
निज शक्ति कपी वीज से विधि विष्णु को, पेदा कियै।
श्त खष्टि कै सम्बध की सामग्रियां साग्रह दिये |
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