मानखो | Mankho

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Mankho by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(ट) श्रावाज से रोकने पर नही सकते तो खेत की रक्षा के लिए लाटी का प्रयोगं आव्य हो जाता है ताकि समाने पर न मानने वाने को अक्ति के प्रयोग ने समझाया जाय । शक्ति की भाषा को यह ससार जल्दी श्रीर सरलता से समझता है ना रण माडों करम जगत जाणी, पण॒ हद रै नाक भालीज 1 डागर नी धिर दकाल्या जद, नाट्‌या ही खेत रुबाट्टीजे ॥ नारद को इमी बात का दुःख है कि मानव को श्रपने अ्रविकारो कीरा * के लिए युद्ध करना पढ़ता है जो मानव जाति के माथे पर एक बडा भारी कलक है - अधिकार मानखं रो सिरे, रण रोद्धा कद ताई होसी । श्रा किख ग्रो ज्ञान पाप, कद मिनख निलाडी स्यू घोसी ॥ न इसके उत्तर मे कृष्ण का यह्‌ तके है कि जवं तकं वलवान्‌ श्रपनी जत्रित के मद में चूर होकर दूमरो का धन, धरती श्रादि छीनने का प्रयत करता रहेगा, “ तब तक युद्ध वन्दन होंगे -- लूठा लूटी चावे घरती, जुद्धा रो रत किया श्रार्व । इसीलिए वे न्याय श्रौर वर्मं के लिए युद्ध का समर्थन ही नही करते वत्कि उमे परम पुण्यं श्रौर परमार्थं मानते है -- रणा जद-जद लोक धर्म कारण तो परम पुन्न परमारथ है । मरजाद मानवो राखण ने । नर पूरा रो पुरसारथ है ॥ पर सुभद्रा भी महाभारत की श्रौर सकेत करते हुए युद्ध की शाइवतना स्वीकार करती है । वह श्रजुन को कृष्ण के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रेरित व तत्पर करते हुए कहती है-- श्रकरम ही मेटणा ने, पारथ, था वो रगत खिंडायो मिनख धरम जुग-जुग जुश्यो है, जद जद श्रकरम श्रायों ॥ हर लेकिन- वर्तमान काल मे भयकर सहार कारी घर्मी का नियंत्रण फ लोगों के हाथों में झागया टै नो उसके सर्वथा श्रयोग्य दे । बावि मे इसी को ध्यान मे रखते हुए नारद के मुख से कहलाया है -- न शः ‡ दु, च ष भ




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