संक्षिप्त जैन इतिहास भाग - 2 | Sankshipta Jain Itihas Bhag - 2

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Sankshipta Jain Itihas Bhag - 2  by बाबू कामता प्रसाद जैन - Babu Kmata Prasad Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। ॐश्रीमहावीरयं नम्‌. अ # धय जै प क्न द, ^ संश्िप्ठ जन इतिहास । इसरा मांग । १० सन्‌ पुरै ६०० से ३० सन्‌ १३०० तक । फक्क ६ जनघमे सनातन है । उतका प्राकत रूप सरल सत्य है। न धमका उमा नामकरण ही यह म्रगट करता हि | 'जिनु पारत रूप । शठ्दसे उक्षा चिकास है; जिसका अर्थं होता है 'नीतनेवाला अथवा ।विनयीः | दूरे शन्पोमे विनयी वीरोक्ष घमं हयी जन घर्म है और यह व्याख्या प्रात सुकगत है। प्रकृतिमें यह वात नेसर्गिक रीतिसे दृष्टि “इ रदी हे कि प्रत्येक प्राणी विन- याकांक्षा रखता है | वद्द नो वस्तु उसके सम्मुख आती है, उसपर अधिकार नमावा चाहता ‡ ओर अपनी विजयपर्‌ भानन्द, नृल्य करनेको उत्सुझ है । अवोध वारक मयानकसे भयानक वस्तुको भपने काचूमें लाना चाहता है। निरीह वनस्पति के लीजिये । ए घाप्त सपने पापतवाङी घाप्रको नष्ट करनेषर चरी हई मिती है । इष वनस्पतिभ भी अवश्य जीवे ३; परन्तु बह उप्त उत्छृष्ट दशमे नी है, निक्तमे मनुष्य दै ! शि इतना होते इये भी वह प्रतिक चै




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