दार्शनिक एवं सामजिक | Darshanik Awam Samajik

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द्दान तथा दिक्षा का सम्बन्ध १५ परख के लिए वैज्ञानिक वातावरण की अपेक्षा विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व की चितन- शक्ति की आवश्यकता है। इसका महत्त्वपूर्ण कारण है कि विज्ञान जब तक किसी वस्तु को भौतिक चक्षु, यंत्रों से देख न ले एवं गणित-विधि तथा भौतिक-दास्त्रीय पद्धति से उसका मूल्यांकन न कर ले, उस वस्तु की सत्ता मे विश्वास नहीं करता एवं उस पर विचार-विनिमय करने से भी इन्कार कर देता है। दर्दन-शास्त्र तथा विज्ञान के मध्य पारस्परिक वाद-विवाद जितना अर्थहीन है उतना ही अन्तहीन भी । वस्तुतः दो प्रणालियाँ बहिष्कार करने की अपेक्षा एक दूसरे की पुरकं है । ज्ञान परस्पर सहयोगी कायं एवं प्रक्रिया है। और फिर ज्ञान की दर्शन अथवा विज्ञान दोनों से अत्यधिक महत्ता है। उचित भावना तो यह है कि ज्ञान-मन्दिर के उपासक अपने-आपको यथाशक्ति इसके निमित्त अपित करें। वे - परस्पर किसी भी वैमनस्य अथवा संघषं मे न पड़ं। दन के प्रभाव के कारण धीरे-धीरे इस भावना का विकास मृख्यतः हो रहा है । बीसवीं शताब्दी में दो उल्लेखनीय विचारधाराओं का विकास हुआ है जिनकी चर्चा अनिवाये है। प्रथम यह कि पहले की भाँति, विज्ञान अब अन्य वैज्ञानिक विधियों का बहिष्कार नहीं करता। वे तो अब ज्ञान की क्रिया को विकसित करने के किए एक-दूसरे का सहयोग दे रहै ह। वे एक-दूसरे को प्रभावित एवं संशोधित कर रहे हैं। उनकी नेष्टा वस्तुओं के स्वेसामान्य रूप से स्वीकृत दृष्टिकोण को विकसित करने की है । मनुष्य के रहस्य का उद्घाटन करने मं जीव-विज्ञान, शरीर- विज्ञान, मनोविज्ञान तथा समाज-विज्ञान पिछले कुछ दशकों की अपेक्षा आधुनिक काल में एक-दूसरे के अधिक निकट हैं। इन विज्ञान-शास्त्रों के सामूहिक प्रयत्न ही हैं जो मानवीय व्यक्तित्व का नव-निर्माण कर रहा हैं। इस प्रवृत्ति का तीव्रगति से विकास करने के लिए विश्वविद्यालयों को भगीरथ प्रयत्न करना चाहिए। दूसरी विचारधारा है कि ददयन-शास्त्र तथा विज्ञान आज दो परस्पर विरोधी सिद्धान्त नहीं हैं। वे पारस्परिक विकास अथवा इस प्रकार कहा जाये कि ज्ञान के हित के लिए एक-दूसरे में अन्तनिहित हो रहे हैं। आधुनिक युग में विज्ञान उच्चस्तर पर उतना ही दर्शन-शास्त्रीय है जितना कि दर्शनशास्त्र अपने मूल रूप में वैज्ञानिक + सत्य तो यह है कि विश्वविद्यालयों मेँ दानिक विज्ञान एवं वैज्ञानिक दर्शनशास्तर आदि का अध्ययन के विषय के रूप' में आविर्भाव न केवल एकीकरण की ओर कदम है अपितु दर्शन-शास्त्र के लिए विजय एवं आनन्द का मंगलमय लक्षण है। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो विदित होगा कि दर्शन एवं विज्ञान दोनों मूलभूत रूप में एक जैसी वृत्ति को अपनाये हुए हैं : सत्य अथवा यथाथं कौ खोज । यद्यपि उनकी




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