हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों में अर्थ परिवर्तन | Hindi Me Prayukta Sanskrit Shabdo Me Arth Parivartan

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Hindi Me Prayukta Sanskrit Shabdo Me Arth Parivartan by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिन्दी में संस्कृत (तत्सम) शब्दों का प्रचलन ७- था । जिस प्रकार फेच, इटेलियन,स्वेनिदा भ्रादि मापाम्रो ने पनी शब्दावली को लैटिन भाषा से दाब्द ग्रहण करके समृद्ध किया, उसी प्रकार भारतीय भापषाधो के लिये भी यह स्वाभाविक ही था कि वे झपनी समृद्धि के लिये भारतीय सास्कृतिक परम्परा की स्रोत सस्कृत मापा से शब्द ग्रहण करें 1 इसके झतिरिक्त भ्रप्रेजी भाषा के सम्पकंमेभ्नाने पर आधुनिक काल में जो नवीन भाव झाये, उनकी अभिव्यक्ति के पिये भारतीय भाषाओं में सस्कूत शब्दो को ग्रहण करना ही श्रथिक उचित एवं उपादेय समभघ्र गया । भारतीय सघ के संविधान (अनुच्छेद २५१) मे यह स्पप्ट घोपितृ किया गया है कि जहाँ तक प्रावश्यक झौर वाछनीय हो, हिन्दी के दब्द-भण्डार के लिये मुख्यतया मस्कृत से श्र गीणतया अन्य भारतीय भाषामो से शब्द ग्रहण करते हुये उसकी समृद्धि करना सघ का कर्तव्य होगा । भ्राजकल भारत सरकार द्वारा जो वैज्ञानिक एव तकनीकी शब्दावली वनवाई जा रही है, उसके निर्माण में सस्कृत वी प्रोर भुकाव श्रावर्यक सममा गथा है, क्योकि दाब्दावली के समस्त देश के लिये होने के कारण अ्रहिन्दी भापी (विशेषकर दक्षिण भारत के) लोगों के लिये सरऊत के याधार पर निमित शब्दावली श्रधिक ग्राहम होगी । देश के सभी प्रदेशो की भापामो मे सस्कृत दब्दो का काफी प्रचलन होने के कारण अधिकतर प्रदेशो के लोगो के लिये ऐसी शब्दावली का समभना अधिक सरल होगा जो सर्कृत के प्राधार पर बनी हो । इसी कारण अन्तर्राष्ट्रीय शब्दावली को ग्रहण करते हुये भी, अधिकतर सामान्य पारिभाषिक शब्दावली श्रौर परिकत्पनात्मक वैज्ञानिक शब्दावसौ का भ्रखिल भारतीय रूप सस्कृत कै श्राधार पर ही बनाया जाना उचित समका गया है । इस श्रकार झाधुनिक कालम सृस्छृत से लिये जाने वलि शब्द दो प्रकार के हैं--एक दो वे जो पिते से सस्कृत मे पये जाति है, कुछ मिलते-जुलते अथं के कारण श्राधुनिक भावो के लिये प्रयुक्त किये जाने लगे है, जसे विततान, नागरिक, सचिव, ससद्‌ श्रादि; दूसरेवे जो विशिष्ट मावो के लिये सस्छृत की धातु, प्रत्यय, उपसमे श्रादि लगाकर बनाये जा रहे है, जसे एल्वम के तिये श्रभितेव' (मभि नेख }, एर ८०८८ के लिये श्म्युदेश' (मभि-+-उदेदा) । इस प्रकार प्रनेक सस्कृत शब्दो के विभिन्न कालो मे होकर स्वाभाविकरूपसे अनेके कारणः तथा झाधुनिक काल मे नवीन भावो के लिये अपनाये जाने के कारण झाधुनिक हिन्दी में सस्कृत शब्द प्रचुर सख्या मे प्रचलित हो गये हैं, शरीर उनकी स्यां उत्तरोत्तर बढती जा रही है 1




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