एक सदी बाँझ | Ek Sadi Banjh

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Ek Sadi Banjh by मस्तराम कपूर - Mastram Kapoor

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गई थी । पंडितजी ने न तों इस पर कभी विस्मय प्रकट किया और न दु ख । पंडिताइन अपनी पूर्व स्थिति को भूल गई थी पंडितजी को इससे बड़ा सुख मिलता था । समाज का विरोध हुआ । लेकिन पंडितजी गाँव से भागे नहीं । यजमानों की संख्या में कुछ दिन कमी हुई फिर अपने-आप सब उन्हीं के पास आने लगे । आखिर गाँव के माने हुए पंडित और ज्योतिषी थे । अमर अपने साथ चावल-दाल तो लाया ही था । कुछ पूरियाँ और तरकारी भी ले आया था । सब लोगों ने पहले नाश्ता किया फिर अमर और पंडित जी भोजन बनाने की तैयारी करने लगे । पंडिताइन और दिवाकर नहाने के लिए जाने लगे । दिवाकर और पार्वती के चले जाने के बाद रूपा बड़ी देर तक वहाँ बैठी रही और पंडित जी के विषय में कछ सोचती रही । उसे आशा थी कि अमर उससे कोई बात करेगा । लेकिन अमर काम में इतना व्यस्त था कि रूपा की ओर उसने ध्यान ही नहीं दिया । इस बात से रूपा के स्वाभिमान को कुछ ठेस लगी और वह उठकर जाने लगी । तभी अमर ने पूछा- रूपा भूख तो लग रही होगी ? रूपा ने इस प्रश्न को इतना साधारण समझा कि उसका उत्तर देना भी ठीक नहीं समझा । अमर ने फिर पुकारा जा कहाँ रही हो? अमर ने कछ अनुमान लगा लिया कि वह नाराज है । तभी पंडित जी बोल उठे अरे भाई इसे मैंने गुस्से में कछ कह दिया था । क्या? कहा तो वैसे कछ नहीं लेकिन मेरी आवाज में क्रोध जरूर था । कोई बचपना किया होगा । नहीं उसका कसूर नहीं था । पंडिताइन मेरी बड़ी ईष्यल्‌ है और कभी-कभी वह इतना कड़वा बोल देती है कि संयम टूट जाता है । मुझे उस पर कभी-कभी बड़ा क्रोध आता है लेकिन पता नहीं उस क्रोध को. मैं कैसे पी जाता हैं? या तो पी जाता हैं या किसी पर उतार देता हूँ। उस पर क्रोध करने की हिम्मत मेरी नहीं होती । बस ऐसे समय जो सामने होता है उसी पर बरसकर हल्का हो जाता हूँ । तुम तो जानते नहीं लेकिन मेरी पंडिताइन बड़ी कमजोर है । बाहर से लगती है यह पत्थर-दिल होगी । पत्थर-दिल है भी लेकिन पत्थर की दीवार के अन्दर जो इसका असली दिल है बहंत ही छोटा है । यह उस कमजोरी को प्रकट नहीं होने देती । उस बचपन की कमजोरी को ढकने के लिए ही इसने कई दुर्गण अपने साथ लपेट लिए हैं । ईइं््या ढेष अहंकार निर्दयता जो कछ इसमें है वह इसका असली रूप नहीं है । असली रूप को इंस औरत ने किसी के सामने प्रकट नहीं किया । मेरे सामने भी नहीं । लेकिन मैं जानता हूँ कि वढ़ वास्तव में क्या है अमर बड़े ध्यान से सुन रहा था । उसने पार्वती में कोई विशेषता नहीं देखी वो । साधारण स्त्रियों की-सी उसकी सब बातें थीं किन्तु पंडित जी की बातों परे भी वह अविश्वास नहीं कर सका । इसके बाद पंडित जी विषयान्तर बोलने लगे भैया यह सारा संसार ही पाखण्ड है । जिधर देखो उधर नकली रूप दिखाई देता है । असली बात दिल में छिपी रहती है । यही 16/एक सबी बॉश




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