लोकमान्य तिलक का जीवन चरित्र | Lokmanya Tilak Ka Jeevan Charitra

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Lokmanya Tilak Ka Jeevan Charitra by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० लोकमान्य तिलक नका ध्येय तो विपयका गम्भीर आर सूवप्म ज्ञान सम्पादन वर भानवान्‌ बनना था । गणित तथा सस्छृत-साहित्यका भुन्होने अति सूबप्म और गम्भीर अध्ययन किया । बेवल पाठ्यक्रममें निर्धारित ग्रन्योपर हीये नहीं निर्भर रहते थे, जिनके अतिरिकत वे अन्य ग्रत्योवा भी अध्ययन करते थे । डेक्कने वालेजके गणित-विभागवे अध्यवप तथा अनुभवी प्राव्यापक केरोपन्त छत्रे ुनपर गर्व करते थे । ओक समय बवपामें तिठकने गणितेका अंक मैसा सवाल सरलतास हल कर दिया जिसवा हठ करना कक्यावे' अन्य विद्याधियोको तो क्या, स्वय प्राध्यापक छत्रेके लिमे भी कठिन धा । आस समय भुन्दोने वड भात्मीमता ओर गर्ववे साय मविष्यवाणीवी थी कि “यह्‌ तिलक किसी दिन दिग्विजय करेया वयोकरि भिसकौ अपनी नमक दु ओर ही है ।” जिस समय विद्याधियोवे प्रिय प्राध्यापक केरोपन्त छव मरणासनन अवस्थामें थे, भुस समय अूनवा अन्तिम दर्शन करनेवे लिखे चारो मोरसे वियर्यी अकवर हुभे । जव मुनके अब परम मित्रने मुनसे पूछा कि आपवी मृत्युके परचात्‌ डेवकन कालेजमें गणित-विमागकौ क्यति कंसे पूरी होगी, तो अुन्हाने तत्वाल वहाँ खडे हु तिलवकी ओर अगुलि-निर्देश किया । तिछक भी अपने सुयाग्य प्राध्यापक वैरोपन्त छषरेपर गर्वे करते धे । ^ भ केरोपन्तका शिष्य हूँ” यह वाक्य वे गर्वसे कहा करते थे । गणितके अध्ययनमें वे ऋषि जसे ध्यानमग्त हो जाते थे । रेखा-गणित जटिछू प्रश्नोवो मुलक्षानेके किमे षण्टो भेकाग्र चित्त रहते भर खाने-पीनेकी सुध भी नही रहती 1 यही बात सस्कृत-साहित्यके सम्बन्ध्मे भी थी । ब्विकुलशेखर काल्दासका भेषद्ूत' तथा 'रधुवश' भौर राजा भवृहरिवा (नीतिशतक अृन्ह्‌ बण्ठस्य थे । सस्फृतफे फचि तिक गणितक धास्यज हते हृञे भी त्तिजककी वृत्ति रागात्मिका थी । येक समय मूके सस्कृतके प्राध्यापक जिनसीवालेने विद्यारियोंसि मातु विलाप विषयपर कवितताकरी रचना वरनेवे लिखे कहा । तिठकके सहपाठियोमें सस्कृत-मेग्रेजी-शब्दकोदाके रचयिता प्रवाण्ड विद्धान्‌ म शि आपटे भी थे 1 विन्तु ध्री जिनसीवलेने निर्णय दिया कि श्री तिलकको सस्छृत-व विता अन्य कदितायोसे मधिक सरस दै । “महता सवंहि महत्‌ * वडोका सब बुछ बडा




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