जैन योग | Jain Yog Chatushtya

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जैन योग  - Jain Yog Chatushtya
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
( १५)दता है उसा प्रबार याग टुखा वा विध्दस कर डालना = । याग मल्युकाभामगु है । नर्वात्‌ योगी कभो मरता नहीं । क्याकि याय आत्मा वा मात से यांजित करता है। मुक्त हां जान पर आत्मा का सता के तिए जम मरण से छरकारा हो जाता है ।थयागरुपी बवच से जब चित्त न्वा र्ता ह ता दाम के तीरण जलस्तर जा तप को भी छिन्न मित्र कर डालत हैं. दुष्ठित हो जाते हैं-योगरुपी बदच से टवराकर व शक्शुय तथा निप्प्रभाव हा जात हैं ।यागसिद्ध महापुस्पा न कहा * कि यदार्विधि सुने हा--जात्मसात विय हुए योग रूप दा असर सुनने वाल के पापा वा क्षय विध्वस कर डातत ^1अशुद्ध-खारमिनित स्वेण अग्नि के यांग स-- आग मे गरठाने स जसे शुद्ध हो जाता है. उसी प्रकार अविद्या--नतान द्वारा सलिन--दूपित था कजुपित आत्मा यायर्पा अग्नि से पुद्ध हा जानी ह 11भारदीय दशना म जन नशन तथा जनत्शून मे जनयाग मरा सयाधिय प्रिय विपय है । जनयायक म्भ मे मैन उन सभी प्रयो का पारायणविया> जा भून उपनघध हा सब । मँ ष्म सम्बध म आचाय हरिम म अ-यधिक प्रभावितह । उदान जाभी लिखा है बह मौलिक टै गहन अध्ययन चिन्तन पर जाधत है ।पिष्टं क्छ यपो समर मनम यट्‌ भाव था कि आचाय हरिभट क इन चारों याग प्रथा पर मैं बाय करू । हिने जगत्‌ का अधुनातन शलौ म सुसम्पात्ति तथा अूटित रूप मे य प्रथ प्राप्त नहीं हैं । अच्छा हा इस कमी की पति हो सर । दमक निए सुझ उत्तम माग दशने तथा सयाजन चाहिए था । दिस सम यहे प्रस्ताव रषं यह गूभ नहीं पड रहा था । क्याकि आज अध्यात्म तथा याग के नाम पर जा काय चले रह हैं. वे ययाधमूलर बम तथा प्रशरित एव प्रचारमूलद नधिक हैं । उन तथाकथित याग प्रबतका मो. आचायों बा अपना-अपना नाम चाटदिए विभति चाहिए प्रचार चाहिए जा उनवं लिए प्रायंमिक है। खर जसी भी स्थिति है कौन बयां वर१ योग कत्पतर धरप्ठां यागश्चितामणित पर योग प्रधन धर्माणा योग मिद स्वयग्रह्‌ ॥ तथा च जमवाजाण्निजरस)ऽपि जरा परा। श्खाना रजयदमा य मूत्याम्‌ स्युन्टाहूत ॥ गुष्ठोभवणि ताशष्णानि म-मयास्राणि सदया 1 योगवमावून चित्त त्ेपरििःवराप्यपि।1 जरयमप्यततु शूयमोण वधाने ^ मीत पाव्रनयायोच्चर्योगिनिदमहान्ममि ॥ मतिनस्य यथा हेस्नों बह्े शुद्धिनियायत'योपासेचतसस्तरविया सलि पत्मन व ‹ योरि १६.४१~ र डे ही बम ही +




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now