चैतन्यचंद्रोदय | chaitnya chandrodaya

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chaitnya chandrodaya  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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' , वेराग्यप्रकरण । ३ चो ० | तातेपरृत भापहिदेखी । प्रय करनचाहष्ं यहि पेखी.॥ धादतत चित मंगजल जग माहीं । धों याहिते स्वतन्त्र है जादी ॥ सचराचर सबही शिर नाई । अतिभ्रारत युत विनयसुद्दाई ॥ चाहों दद् वरदान न आना । स॒नह सकल विनती देकाना ॥ प्रथस रुपाकरि करिय उपाई। जिसि ममभाश पूर्ण हैजाई ॥ दजे याहि रचत भ्रम नास्ता। विपय विराग होइ श्रन्यासा ॥ सि सुन्दर वेदान्त सुजाना। आदर करहिं सन्त गुणवाना ॥ हुक चूक लखि यामह ज्ञानी । करोथ न करहि वालमतिजानी ॥ ` दो०। लद्िहं जे ज्ञानी पुरुप वोविर्वषि भानन्द्‌ । देविदेचि हंिरैवहत याको खल मतिमद ॥ सो०। सतू चितू आनंद रुप जो आत्माहे ताहि मम । | नमस्कार ह भूप फे सोहे सत्‌ चित्‌ भनद॥ छ ० राम । फहवासो । सवजासों ॥ यदहभासे । जगभ्रासे ॥ झरु जाही । सबयादी ॥ सिलिजावे । थिति पावे ॥ दो०। नमस्कार तिहि भामा को अरु ज्ञाता ज्ञान । ज्ञेय रपर द्रष्टा बहुरि दरशन दृश्य प्रमान ॥ च० । कत्त करण क्रियारैजोई । जास सिद्धि होतदे सोई ॥ ज्ञान रुप आत्मा जो ऐसा । नमस्कार रह ताको कैसा ॥ जिसझानंद जलघिके कणकरि | आनंदित सम्पर्ण विद्वभरि ॥ झरु वहोरि भ्रानद करि जाही । सब जीव जग यावते भ्राही ॥ श्रार्नद रूपात्मा को ताही। नमस्कार... वारम्वाराही ॥ एक सुतीष्षण नाम को गैऊ। होत शिष्य अगस्त्य को मैऊ ॥ संशय यक ताके मन साहीं । उपनी ताके निहत काही ॥ गमनकियो भ्रगस्त्यफे धामा । स्थितिभेकरि पिधिसहितप्रणाम॥ दो०। अपर नघ्रता भावतो शीन्यो प्ररन रसाल्ल। जोसुनते गदृणदभयो म॒निमन मधिकदयाल् ॥ चौ०। तब सुतीक्षणकंह हेमगवाना । सबतत्त्वज्ञास्त्र सबजाना ॥ ` संशय यफ़ मोरे मन मादी निदृत करो रुपा की बाहीं ॥




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