स्वामी रामतीर्थ की संक्षिप्त जीवनी | Swami Ramteerth ki Sankshipt Jeevani

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swami ramteerth ki sanchipt jeevani  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्वामी रामतीथ । श आँखुओं से कपड़े भीग गए. | वे सैकड़ों भकार के करुणा-पूर्ण हदय-वेधक वाक्ष्यो का उष्वारण करते थे । अंतमें.ये ई््वर से अत्यंत विगलित चित्त से; निश्न-लिस्थित प्रार्थना कविता रुप में करने लगे-- ५ कुदन के इम डे हैं जब चादे तू गला ले ; बाचर न है ता दमके ले आज भाज़मा ले | जैसे तेरी खुशी दो सब नाच तू. नचा ले ; सब छान-वीन करले दर तौर दिल जमा ले । राज़ी हैं दम उसीमें जिसमें तेरी रज़ा है ; याँ याँ भी चादवा है और वां. भी चाइवा है ॥ या दिलसे अब खुश हकर कर मके! प्यार प्यारे ; रुवादद तेग्र [खिंच ज़ालिम कड़े उड़ा हमारे । जीता रखे ठ्‌ दमकेा या तनसे सिर, उतारे ; अब राम तेरा आदिक कदता है यों पुकारे। राज़ी हैं दम उसीमें जिसमें तेरो रज़ञा है ; याँ योंभीचाहचा है और वो भी वाद वा है! घुनकी भार्थना जिन कानों से खुनी गई थी; प्रह,लाद' की पुकार जिन कानों में पहुं ची थी; दौपदी के करुण-कद्ल ` ने जिन कर्ण-कुदरो मे पवेश किया थ, प्राह-अरसित गज की. गुद्दार जहाँ लगी थी, नचयुचक तीर्थराम का सआर्त-नाद भी उन्हों कानों में पहुँचा । भगवानू ते आज भी व्याघ्र वनने का तैयार हैँ; कितु, कमी है प्रद.लाद जैसे भक्तों की ! दुखरे दी दिन कालेज के दठवाईं» झंड्रमऊ ने .तीर्थरामजी . से प्रार्थना की कि गोसाईजी ! साछ-भर, सदी आप. मेरे ही घर खादिया करें:। उसने रहने :के - छिये: अपना: घर भी




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