आधुनिक ब्रज भाषा काव्य | Aadhunik Braj Bhasha Kavya
श्रेणी : काव्य / Poetry

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutMuseelchandra Varma
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
172
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about मुशीलचन्द्र वर्मा - Museelchandra Varma
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ९५)
इसी प्रकार कारकों की विभक्तियों को शब्दों के साथ श्रॉर शन्दों से
'पुथक रखने की भित्न-मिन्न शेलियाँ मी श्रव तक उसी प्रकार श्रनिशिचत
-रूष से चल रदी ई ।
निष्कर्ष यदद है कि भाषा के परिष्कार, स्थैय्यं श्रौर नियन्त्रण की
` श्रोर श्रयावधि यये्ट रूप में कार्य नहीं हो सका । इसमें सन्देह नहीं कि
“रत्नाकर' श्रौर उनके साथ के कवियों ने इसके लिए, स्ठुत्य कार्य किया
है; इसके लिए श्रावश्यक्रता श्रव केवल कवियों के संगठित होकर
-मतैक्यर्थिरता श्रीर सददशारिता की दी दे ।
सम्पादन के सम्बन्ध मे-- यद्यपि श्राघुनिक् त्रनमापा कवियों के
एक सर्वा गपूरं सन्द्र-घंम्रह के उपस्थित करने का विचार हमारे मन्म
वहत पटले से दी या; किन्तु वह् कायं अनेक कारणों से अब तर पूरा न
हों सका--'दाँ; यद्यपि इसके लिए. श्रावश्यक सामग्री श्रवश्वमेवर एकत्रित
हो चुकी दै । कुछ बपं पूर्व हमारे सम्पुख एफ दूरा विचार इस सपमे
'्राया कि विश्व विद्यालयों के विद्यार्थियों को श्राघुनिक खड़ी बोली-काव्य
से परिचित कराते हुए; श्राघुनिक श्र जमापा-काव्य का भी परिचय देना
खमीचीन दे । श्रतः उस संग्रदद के कार्य को स्थापित्त कर इस विचार से दी
प्रथम यह संग्रद यदाँ उपस्थित किया ना रहा है । इसमें इलीलिए; श्राधु-
'निक त्रनभाषा के केवल ऐसे ही चुने हुए कवि रक्ते गये, जिन
'के स्थान बहुत-कुछ साहित्य-क्ेत्र में निश्चित दो चुके है श्रीर जिन्हें
अतिनिधियों के सम में लिया जा सकता है । इस सम्बन्ध में मत-मेद दो
। सकता है श्र उतका होना स्त्राभाविक ही है, किन्तु हमने यददाँ श्रपना
५एफक विशेष दृट्टिन्कोण रस्ा है ।
दूष्या विचार इमे यई रह्म है कि जहाँ तक हो सके उन्हीं कवियों
:को यहाँ लिया जाय, जिनके काव्य-्रन्थ प्रायः साहित्य-संतार में श्रा चुके
ईः जो भ्रषिद्ध तथा सुपरिचिच ई । एक श्रच्छी संख्या इस समय श्रज-
भाषा-कवियों की ऐसी मी है, लिनकी रचनाएँ कवि-षम्मेलन श्रादि के
श्रवसरों पर हो सुनने को मिलंती दें; किन्ठ पुस्तंक-रुप में वे शव तक
झा० न्न० का०--र्
User Reviews
No Reviews | Add Yours...