सुदर्शनचरितम | Sudarshanacharitam

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Book Image : सुदर्शनचरितम  - Sudarshanacharitam
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रद्काव्ध्वा |) ।अनेक दाखाएं स्थापित हुईं जंसे कारंजा ब जेरहटमें षं» १५०० के कमभन, उत्तर भारत की कुछ झालाएं सं० १२६४ के लगभग, दिल्‍लो, जयपुर, ईडर व सुरत श्ञाखाएं सं० १४५०, नागोर व अंटेर सं० १५८०, भानपुरमें सं० १५३० के लगभग तथा लातुरमें सं० १७०० के लगभग शाखाएं स्थापित हुई ।प्रस्तुत ग्रन्थमें बलात्कारगणके जिन आचार्योकां उल्लेख पाया जाता है वे उत्तर भारत तथा सुरतको शाखा में हुए पाये जाते हैं। उत्तरकी ज्ञाखामें प्रभा- चन्द्रका काल सं० १३१० से १३८५ तक और पदमनन्दिका सं० १३८५ से सं० १४५० तक प्रमाणित होता है । पद्मनन्दिके दिष्य देवेन्रकीरसिने सूरतकी क्षाखाका प्रारम्भ किया । उनका सबसे प्राचोन उल्लेख सं० १४९९ वैशाख कृष्ण ५ का उनके द्वारा स्थापित एक मूत्तिपर पाया गया हैं । उन्होंके पटु-दिष्य प्रस्तुत परन्थके कर्ता विद्यानन्दि हुए; जिनके सम-सामयिक उल्लेख उनके द्वारा प्रतिष्ठित करायी गयी मूर्तियों पर सं० १४९९ से सं० १५३७ तक पाये गये हैं ( मट्टा० सम्प्र० क्र० '४र७-४३३ ) ।विद्यानन्दिके गृहस्थ जोवन सम्बन्धी कोई वृत्तान्त प्रत्थ-प्रशस्तियों या अन्य लेखोंमे नहीं पाया जाता । केवल एक पट्टावलो ( जे० सि० भास्कर १७ पृ० ५१ व भट्टा० सम्प्र० क्र० ४३९ ) में अछशाखा-प्राग्याटवंशावतंस तथा 'हरिराज- कुलोद्योतकर' कहा गया है जिससे ज्ञात होता हैं कि वे प्राग्वाट ( पौरवाड) जाति के थे, तथा उन के पिता का नाम हरिराज था । पौरवाड जाति में, अथवा उस के किसी एक वर्ग में आठ शाखों की मान्यता प्रचलित रही होगी, जेसा कि परवार जाति में भी पाया जाता है ।प्राग्बाट जाति का प्रसार प्राचीन कालसे गुजरात प्रदेशमे पाया जाता है । इसो प्रदेश की प्राचीन राजधानी श्रीमाल (आधुनिक भीनमाल थी) जो आबूके प्रसिद्ध जैन मन्दिर बिमलवसहीके निर्माता प्राग्वाटबंधीय मंत्री विमलशाहुका पैत्रिक विदास स्थान था । इस प्राग्वाटबातिमें दिखानन्दिके गुरु भट्टारक देवेन्द्र कीतिका विद्षेष सान रहा पाया जाता है । उन्होंने पौरपाटान्वयको अष्टयाखाबाले एक श्रावक द्वारा संबत्‌ १९९३ में एक जिन मूरतिकी स्थापना कंरायो थी ( मटर सम्श० ४२५ ) संबत्‌ १६४५ में धर्मकोति वास अ्रतिष्ठापित मुरतिषर पौरष




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