श्री बयालीस लीला | Shri Bayalees Leela

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Shri Bayalees Leela  by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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® बृन्दावन सत सीलं ® १३ बृन्दावन घुख रंग को, कां न -पायो योर ॥ दुर्लभ दुर्घट सबनि ते, बृन्दावन निज भौन । नवल राधिका कृपा विनु, किध पे कौन ॥ सवे भग युन दीन दों, ताकौ जतन न कोइ । एक क्सोरी छपा तें, जो कहं दोह सो दई ॥ सोर कृषा अति सुगम तर्हि, ताकौ कौन उपाव । चरन शरन द्रिवश की, सहजदि वन्यो -वनाव ॥ दरिविश चरन उर धरनि धरि, मन वच के विवास । कुँबरि छुपा हू हे तवदि, , भरु वृन्दावन वास ॥ प्रिया चरन वल जानि के, बाद दिये हुलास । तेदैऽर मेँ आनि है, वृन्दा विपिन प्रकाम ॥ केषर किसोरी लादिली, कस्नानिधि सुङ्कमारि । रनौ बृन्दा विपिन कौं, तिनके चरन सँभारि ॥ हेम मई वनी सज, रतन खचित वहु 'रग । चित्रित चित्र विचित्र गति, छवि की-उठति तरग ॥ वृन्दावन कलकनि कमक, फूले नेंन निहारि रवि शशि दुतिधर जँ लगि, ते सव डारे वारि ॥ वृन्दावन दुतिप्च की, उपमा कौं कषु नार्हि । कोटि फोटि वेय ह, तेहि सम कटे न जादि ॥ लता लता सव कल्पत, पारिजात सव फल । सदज एक रम रहत दे, फलकत जगना एन ॥ कज कुज छति प्रम सो,कोटि कौटि रति मन। दिनि संभारत रहत दै, भी बृन्दावन पेन ॥ पाठान्तर हित पर मिञ उर परनि धर ।




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