गाँधी- गौरव | Gandhi Gaurav

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Book Image : गाँधी- गौरव  - Gandhi Gaurav
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दूसरा सर्ग टशणा दद्दों के थे दढ़े रणयीर निज प्र के घनी दीवाम उत्तमचद उनके कुराख, प्रमु-सेयक्, गुमी। पर, स्वाभिमान कमो न सेषा पर मिक्वावर था किया मा करमचंद सुपत्र ने सी तात का हो पप लिया।भहनम स्मर्वे्र स्वमाव भी प्रमु का न अंधा मक्त था करना पड़ा सिर पदपि नगर परिस्पक्त था । मिक सनकी सुपत्नी पिरत ,थी नित्य्म निनाश्ष्वी सब नियमपूर्वकं सुता ।६ चननी इमारे चरितनायरु की षदी गर्वं पी आदर्श सया र्मम्‌ कौ सस कीतिं पिय । था सन अठारइ सो श्दत्तर द्विवीय प्मष्टोमर अहा ! मोविर्मयी पौ जम्मठिभि मोहन महारमा शी मा ।# ॥परसुदरित प्रभाकर की कका थी विमक्ष नम में छा रही सच मॉदि शोमा शरद की थी प्रकृति कये सरसा टी ¦ सुन्दर सोने स्याम रिष श्च द्रो रह अवतार था , छनमी, अनकूस्यो गम्ममू के ष्ठ का लो दर था।११




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