जैन्तत्वकलिकाविकास | Jain Tatva Kalika Vikas

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Book Image : जैन्तत्वकलिकाविकास - Jain Tatva Kalika Vikas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥| (४) दी ।उस समय श्री श्री श्री १००८ स्वामी लगजचन्द् जी महाराज भी.परियाह्ञे म ही व्विरप्जनमान थे 1 श्राप आचाये पद देने के पश्चात्‌ श्रस्बाला शोर साढोरा की ओर विहार कर थये १ फिर श्राप साढोस, झस्बाला, परियाज़ा, नामा, मलेरकोटला, रामदेकोट, फीरोज्ञ धुर, कसूर, लाहौर होते इए शजरांवा्ते म॑ पधार शयु | वहां पर रावली वाते श्रावकों की रस्यन्त विज्ञप्ति होने से फिर झापने रावलपिंदी की ओर रवेहार कर दिया । मार्य सें वज़ीराबाद, कुंजाद, जेहल्म, रोहलास, करलर, भे धर्मोपदेश देते हुए आप रावलपिंडी में विराजमान होगये । १४४८ का चतुमौस भ्नापने श्चपने खनि- परिवार के साथ रावलपिंडी शहर में ही किया । इस चतुर्मास में धर्मप्रचार चहुत ही इश्ना । इसके अनन्तर 'ाप श्रजुक्रम से धर्मप्रचार करते हुए स्यालकोट भं पार यष्‌ । बां पर भी अत्यन्त धर्मभ्रचार होने लगा, चां के श्रावकव्मं ने भअापको चातु- मास विपमक विक्षि की । किर श्राप श्री जी ने श्रावकचर्ग का भ्त्यन्त भाग्रह देख- कर उनकी दिदि को स्वीकार कर १६६० का चतुमास स्यालकोट का मान जिया । चीच का शेय काल श्रष्धतस्षर, जम्बू श्रादि हेतो मे धर्मभ्रचार करके १९६० का चतुमौस स्यालकोट मे चापे किया ! चतुमास मे बहुत से धर्मकार्य हुए । चतुमौस के परात्‌ श्राय श्मतसर एधारे । वहं पर श्री पूज्प सोहनलाल जी महाराज वा मारवाड़ी साधु शरी देवीलाल जी महाराज वा प्नन्य साघु चा श्रार्यिकार्य भी एकत्र हुए थे । उन दिनों मे गच्छ मे बहुत सी उपाधियै भी विलीय हुई थीं, । उसी समय श्रापको “गणावच्छे- दक चा “स्थविर” पद्‌ से विश्रुपित्त क्रिया गया था | इसके पीछे झापने चहां से विददार कर दिय 1 कंतु आपको श्वास रोग (८ दमा ) प्रादुभूत दोगया ¡जिस कारण चहुत दूर विहार करने में चाघा उत्पन्न दोगई | तब आपने १९६१ का चतु्मांस फरीद्‌- कोट शहर से कर दिया । ३६६२ का चतुर्मास 'झापने पटियाले में किया । २६६३ का श्रम्वाला शष्टर में किया । सब श्ापके साय 'चतुर्मास से पूर्व मारवाड़ी साझ' भी कितना काल विच्चरते रहे 1 ६, ए2घएाजरटट जरा गाज ण ४ < 2.75 +> 1-2-23 | (*६; ५ ~~ ६०. 9) ~~~ रन > 1८25254 ( न ८ ६०.०2६ १६६४ का चतुरा श्रापने रोपड श्र मे किया 1 इस चतुमांस में जैनेतर लोगो को चम का महत सा ज्ञाभ पहुंचा । नागरिक लोग श्वापकी सेवा मे दुत्तचित्त होकर धर्म का दास विशेष उठाने लय गये । किंतु रवासरोग (दमा) का कटै भकार से भत्तिकार किये जाने' पर भी चह सान्त न हुआ | 'झत्तएच झापको कई नगरो के लोग स्थिरवास रहने की विज्ञप्ति करने कगे; किंतु श्रापने उनकी विज्ञप्ति को स्वीकृत नहीं किया । अपने आत्मवल से विचरते ही रहे । कई वार झापको सागे में वा आसों में रचासरोग का धवल वेग (दौरा) होगया, जिस कारण आपकी शिप्य मंदली को घर्त्र की ठोली {> 2 १००० 2 प ल= १6८२2 ६, 7-८-2४ 1;




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