सरित दीप | 1332 Sarit-deep; (1942)

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तरीय स॑ २७ | कहे देंगे उसको 'अल्दढ़' एक शब्द में, थी खडी हुई प्ट पकडे द्वारं मध्यम, आँखों ने पूछा मानो थाओगे कब, रह गईं खुली ही उत्तर के दवित वे तब । बहू चित्रकार सुन्दरता निरख रहा था, र्गाग श्रदुल, शांखों से परख रहा था, हता जो भी शज्ाग पुलक भर देता, दूलिका फेर कुछ जीवित सा कर देता । १. लो छूए उसे ओष्ठ मधुर युग भ्रव ही, सुस्कान भरी आ उन होटों में तब ही, लो. फेरी झंधा-बुंध तूलिका सिर पर, हिल पढे वायु में झदु कतल हरा कर! थं भर देता था जीवन बह णण में, थीकला चित्र के एक एक कण-कण में, उस कलार के कर दिलते शच ऐसे, चलती है. शफरी सलिलप्राशि में जैसे




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