मुक्तधारा | Muktdhara

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Muktdhara  by धर्मेंद्रनाथ शास्त्री -Dharmendra shastriरवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur

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धर्मेंद्रनाथ शास्त्री -Dharmendra shastri

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रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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देएक निकट आध्यात्मिक सम्बन्ध है । मुक्तधाराका प्रवाह ओर जीवन उसके अपने जीवनके खत दै । फलतः ऐसा प्रयत्न करना वह अपना पवित्र कर्तव्य समझता है कि जिससे सब लोग झरनेके प्रबाहका लाभ उठा सकें ।'*“राजाकी आज्ञासे राजकुमार बन्दी किया जाता है, क्यों कि राजाको विश्वास हे कि दण्डित होनेसे राजकुमार खधर जावेगा । इस बीचमें उत्तर कूटके लोगोंमें बहुत अशान्ति बद्‌ जाती है । कुछ नागरिक चाहते है कि राजकुमारको इस बातका दण्ड मिले कि उसने अपने लोगोंके विरुद्ध शिवतराइके लोगोंका पक्ष 'लिया । दूसरे लोग उसे मुक्त कराना चाहते हैं । अन्ततः आग भषक उठती दे जो कि जान बूझ कर लगाई गई थी । इस प्रकार राजकुमार अपनेको बन्दी- 'गृहसे मुक्त कर लेता है और वद्द अपने निश्चित उद्देेयको पूरा करनेके लिए निकल पढ़ता हे । वह चुपचाप यन्त्रके भीतर घुस जाता है और उसके पुजोंको खोल देता है जिससे कि झरनेका पानी अनेक धाराओंमें फूट पढ़ता है और यन्त्र नष्ट हो जाता है । इस वीरतापू्णं कायरम राजकुमारी मृष्यु हो जाती दहै । वहं मृ्युके लिए पूवैसे ही तैयार था । झरनेको स्वच्छन्द देख कर राजकुमारको अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है । वह अपनी माता मुक्तधारा क्षरनेके गभे चुन: लौट जाता है।””राजकुमारका दुःखमय अन्त सारे नाटकके रूपकको समझनेकी कुज्ञी है । -मनुष्य जातिकी उन्नति तभी संभव है जब कि मनुष्य अपनेको संकुचित स्वार्थोसे कपर उठा सके । जब कि वे लोग जो कि मनुष्य जातिके निवांचित नेता हैं, आदशेके आगे संसारके सारे ऐशइवर्योका, यहाँ तक कि अपने जीवनका भी, बलिदान करनेर्मे संकोच न करें ।एक ओर सीमासे आगे अन्ततक पहुँचे हुए जातीयताके भाव हैं जो कि दूसरोंको हानि पहुँचा कर अपना क्षणिक राजनीतिक स्वाथ पूरा करना चाहते हैं और दूसरी ओर सारी मनुष्य जातिके प्रति श्रातृत्वका भाव है। इन दोनों सिद्धान्तोंका इस नाटकमें कई अवसरों पर अच्छी तरह प्रकाश हुआ है । उदाहरणार्थ संकुचित देशभक्तिका प्रतिनिधि एक स्कूलमास्टर अपने विद्यार्थियों ` सहित रंगमश्व पर आता है । उसने अपने विद्यार्थियोंको राजा रणजित्‌की अदसामें एक प्रभावशाली वाक्य याद करा रक्‍खा दै । इस्र उपायसे रुकूलमास्टर-




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