गृहलक्ष्मी | Grihlaxmi(1968)

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Grihlaxmi(1968) by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ दशन] लीला ॑ ७९8 = --- --~ ------~ , --- - ------------------------ -- ~ ----. - कल - ~~ ------- - --*~ ~ . , --~--------------* ~ ' ---- -~ -^~ ` ~---- लीला--बडी तो म हो गई दह) बाबजी तो उस दिन कह रहे थे, “लोला अब बड़ों हो रई है ।” पावंती--झौर भी वड हो जा, तव सब बाते समभाने लगेगी तब तू मेरो तरह पेड़ मे पानी सचा करना, ५हस्थीके काम घंघे करना । झब क्रेगीतो तुभे दुःख होगा | लीला--क्या इसीसे दुख होता हैं ? ता तुमको भी इस काम से दुख होता होगा ? पावंती- नदीं । लीला--फिर सुभं दुःख क्यों होगा पाचती- दुःख चाहे न हो, पर पानी लग लग के तू बीमार हो जायगी । इससे एह्िखे लीला बीमार हो गयी थी, सो बीमारी का हाल वह अच्छी तरह से जानती थी । झब माता की बात सुन कर उसकी श्रंखं डबडवबा श्रायी । उसने रोनी सी होकर कहा,--“तब तुमक्तो भी तो पानी लग लग के बीमारी हदो जायगीःः। माता ने उसके आँसू पेछि कर कहा, “नहीं, इससे मेँ बीमार नहीं पड़ गी 1 माता की बात सन कर कन्या को अचम्भा हुआ । उसने पूछा “फिर में कंसे बीमार हो जाउँगी ?” पार्वती इस “केसे” का उत्तर केसे देती ? तथ मा बेटी दोने जल सींचने लगीं । माता बडी गगरी में पास के ताल से पानी भर लाती नौर लोकी, कांड, शाक्र भाजी झादि के पेड़ों में पानी डालती रह्दी । लीला भी माता की देखा दखी एक लोटे में उसी भाँति पानी भर भर कर पेड़ों को खींचती रही । इस भांति लीला इतनी छोरी ही श्रवस्थासे माता का हाथ बेरा लेने की शिक्षा पाने लगी । वह दूखरी लड़कियेँ को भांति भूठे खेल कभी नहीं खेलती । माता के साथ साथ रह कर घर के सच्चे खेल खेलने ही उसे अधिक रुचते थे । संध्या के समय चंद्रमा की चांदनी में बैठ कर जब माता चरखे में सूत कातती तब कन्या उसके पास बेठ कर कपास संवार देती थी । कुछ श्र




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