साथी हाथ बढ़ाना | Sathi Hath Badhana
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
325
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)धारा ओर किनारे 9प्रताप
निशाप्रताप
निशाप्रतापनिशा
प्रतापनिशा
प्रतापप्रेम समय, मैं तुम्हारी हा गई । तुमसे विवाह 1यह सव किसने कहा तुमसे, यट भूठ है, निशि ।ऋूठ 1 उफ 1 निशा नाज वह पहले वाली भोली निशा
नही जो तुम्हरे मूठ को भी सच समयते । वैकमेअदूट
घन रहते हुए भी, कितने डाकें डलवाये तुमने * क्तिने
निरीह वालको को जनाथ बना डाला ? यही तो था न
तुम्हारा व्यापार, जिसके लिए तुम्ह दूर-दूर जाना पडता
था क्या ण्ह सब झूठ है * वाला! वौलो। तुमने यहू
सव क्यो विया प्रताप? क्सिलिए ? ऐसा क्या लोभ
था कि. (रोती है)निशा ! होश की वातें करा ।
होश में ही ह श्रताप । दु ख ता केवल इतना है कि पहले'
ही होश क्यो नहीं थाया । कटघरे मे तुमह खडा देखने
से पूव, पुलिस कौ शहादतं सुनने से पहले ठी, मै क्यान
समक्ष सकी, वि मनुप्यके स्पमे तुम कितनं वडे
निशाचर हो ।(कुछ हेसकर) तुम सच टी कुछ पगला गई हो निशि ।
क्या तुम नही जानती कि निरपराध मनुष्य भी कभी-
कभी ऐसे चक्कर में फंस जाता है कि उसे जेल की हवा
खानी पड़ जाती है ।(व्यग्यसे) तो तुम निरापराध हो ?(अधीर स्वर म) क्या तुमह मुञ्च पर विदनास नही?
नहो, पर एव न एक दिन मैं तुम्हे विश्वास दिला ही
दूगा । किस्तु निशि, अव समय नहीं । चलो, मेरे साथ
भाग चलो । मैं तुम्ह लेन आया हूँ ।नहीं नही मैं तुम्हारे साथ वही नहीं जा सकती ।पग
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