बाहु - वली | Bahu - Bali

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Bahu - Bali by श्री हीरक - Sri Hirak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वृषभवेराम्य वृषु-भेश देखते थे त्नी, इस शोर प्रकृति के प्रांगण में । अभिराम भाव शत प्रत्रिबिस्वित, होते आदश-सहझ मन में ॥ बढ़ चलने भाव घन-पुंज हुए बन गया बह अचल स्थायिभाव । उछुसित हुए मन मेँ शतशः, दृषभेश दीन वेभव-प्रभाव ॥। उपवन मे देखा जा बसन्त, मलयानिल कलिय से बोला । खोलो धुंषट-पट देखो तो, सुषमा ते बदला नव चोला ॥ कोकिल बोलीं प्रति पल्लच पर, दी धीरे ताल पवनने थी। हो गया समोरण मन्तहृद्, आशा जागी मिलने को थी॥ शत शत रसाल्ल, शत नीप, लता, सव मे समानता आहं थी । माधव में था गत निज विवेक, मादकता सवम छाई थी ॥। पुष्पों की राजि निहार रही, थी लगा दृष्टि नम ओर अचल-- उस विधि को जिसने उसको दी, बह्‌ दान-हेतु निधि सुरभि विमलञ॥ वृक्षाभित दोला पवनेरित. अयो भूल रदा युवती मंडल ! बल्ली-त्रितान था जा रहा, नभ ओर यान लखकर अंचल ॥ युबरतीं मदमातीं चलती थी, युवकों का मन था रीक रद्द । उनके अंगों की सौरभ से, था, मलय-पृवन तव खीज रद्वा ॥ था पूर्योदय पर सुयमुखी, थी, मुरभाई लख चन्द्रोदय । इसक्िए शनैः करताडनसे, बदल्ला ज्ञेता जाता था वह ॥ माधग्रीलवा थी अतिकंपित, थी श्राम्नलता भी शरमीन्ली। वेला वेक्ञा मे लजा रही, थी चंपा बेवारी पील्नी॥ नलिनी नीली पढ़ गई देख, उनके कंजों में नयन-युगल । मेचकित मसण, जिनसे सुंदर, दरिणी के द्ारे नयन-चपल् ॥| मधुकर मनर बह टश्य देख, कविता करते सण-कण॒ पंदर । प्रतिपद्‌ सुम्नो से ज्ञे पराग, मूखरिव्र करते नव गीत मधुर ॥ पाच




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