शेखर संघर्ष भाग - 1 | Shekhar Sangharsh Bhag - 1

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Shekhar Sangharsh Bhag - 1 by सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन - Sachchidananda Heeranand Vatsyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शखर १९ शेखर चुप हो गया | आगे पढो ।” पीड़ितस्वर से शेखर ने कहा, “मुझे क्षमा करे, इस समय और पढने की इच्छा नहीं है ।” “इच्छा नही है * वयो ?* पर तुम ठीक कहते हो । तुम्हे मुझ पर दया आती हे न ?”' शेखर ने उत्तर नहीं दिया । लेकिन में कहती हूँ--” आवेश में मणिका उठ बेठी--“'तुम गलती करते हो। और तुम बिना वुलाय क्यो आयं ?--चले जाओ--मेरे एकान्त मे विध्न बनकर मुझ पर दया करनेवाले तुम हो कौन ?” शेखर लौटने के लिए फिरा, तब मणिका फिर हँसी--“मे नदी मे हूँ न, मे+ जानती हे । केसी बेवकूफो-सी हँसी है मेरी । हाँ, तुम जाओ । बुलाने पर ही' आना, समझे ? ” शेखर चल पडा। “मे ठीक कहती हूँ । 8012 £ 9061 €0त8, गरीर इसी के काबिल है। इसी के काबिल । तुम मूर्ख हो, मूर्ख, मेरे जान दि वेप्टिस्ट 1 ”” वाहर शेखर को याद आ रहा था, एक दिन पहले वात-बात में मणिका ने पूछा था, “आप को कोई गौक है? और उसने योही कह दिया था, “मुझे चित्र सम्रह करने का शौक है।'”' नूचछफ प011६6165111 (कितना असुचिकर ) कोई जीव नहीं ?” गेखर ने बताया कि बहुत पहले उसे पशु-पक्षी पालने या तितलियाँ पकड़ने का शौक था, अब नहीं रहा । “वस ? ] ८0116८7 0८01 (मे तो पुर्पो का सग्रह करती हूं।) कंसे-कैसे अजीब नमूने होते हे--लेकिन--'एकाएक उसका स्वर ऊब और थकान से भर गया था-- चमडी के नीचे सव एक-से । असभ्य, अभस्कृत-लोटुप पबु 1 “ उस दिनि का यह वार्तालाप याद करकं शेखर के मन ने जोडा-- “चमडी के नीचे सव एक-से--सञ पुरुष, सव स्त्रियो--पुरष ओौर स्त्री, स्त्री और पुरुप ” + ्: कर कं मैं गेर +£ दति ह, पर आंत नही, कोर लेते हे, पर पचा नहीं सकते--' चमडी के नीचे सब एक-से--लोलुप पद्ु--' 'जान दि वेप्टिस्ट-' तुम मूखं हो, मूर्ख-- मन में दृढ़ निश्चय किये हुए कि अब वह विना वुलाये क्या, बुलाने पर भी मणिका के यहं नटी जायगा, कालू से लडने के बाद चतुरसेन के दल से वहिष्कृत, अपने से कम वुद्धिवालो से अभिमान के कारण खिंचा हुआ, बार-बार अधिक खर्चा माँगने पर सन्तोपजनक उएसरा से आते से घर से अपसना रो = ~~ {गाः नै ~ ~>




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