गगनाञ्चल | Gagananchal

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Gagananchal by डॉ अमरेंद्र मिश्र - Dr. Amarendra Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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स्मृति के बहाने राहुल सांकृत्यायन 13 भविष्य का बोध भी है। तीसरी पुस्तक “साम्यवाद ही क्यों ?' इसके समर्पण के शब्द देखं-- जिसने अपने विशाल राज्य मेँ तीन बार धन का समवितरण कर साम्यवाद का क्रियात्मक प्रयोग किया, ओर इसी कारण जिसे माता ने विष दिया, उसी के नगर में लिखा यह ग्रंथ उसी साम्यवाद्‌ के पुराने शहीद मुनि-चन्‌-पो (845-46 ई.) की स्मृति को समर्पित ।'' अब आइए इस पुस्तक की विषय सूची पर पूजीवाद की उत्पत्ति, साम्याद्‌ क्यों पैदा हुआ, क्या पीछे लौटा जा सकता है, हमारी भयंकर दरिद्रता की दवा साम्यवाद, हमारे सामाजिक रोग और साम्यवाद, साम्यवाद और अच्छी संतान, साम्यवाद तथा धर्म और ईश्वर, साम्यवाद और स्त्रियों की परतत्रता, साम्यवाद ओर मुसेलिनी और हिटलर के ढंग, साम्यवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, साम्यवाद में यंत्रों से प्राप्त अवकाश का उपयोग, साम्यवाद का भविष्य और उसके शत्रु-मित्र । साम्यवाद और सोवियत संघ दोनों अथवा रूस आज चर्चा के अद्यतन विषय हैं । ऐसे समय में राहुल का यह चिंतन आज भी शत प्रतिशत सामयिक है | राहुल जी को जानने वालों की तथा उनके साथ रहे तथा जिए, काम किए, सैकड़ों लोग आज भी हमारे बीच हैं। उनमें कई लोगों से मैं मिला हूं तथा प्रयास किया है कि इनके माध्यम से राहुल जी को समझूं। लगभग हर जगह मुझे निराशा हुई है क्योंकि उनमें से अधिकांश लोगों ने उन्हें नहीं समझा । 1940-42 में राहुल जी हजारीबाग जेल में कैद थे। उनके साथ रहे एक स्वतंत्रता सेनानी से बातें हुई तो मैंने जानना चाहा कि राहुल जी की दिनचर्या वहां क्या रहती थी, तो अन्यमनस्क से बोले-यही कि वे दिन-रात कुछ लिखते-पढ़ते रहते थे। ऐसा लगा, मानो वे यों ही अपना समय बर्बाद करते रहे, जब कि इतिहास साक्षी दै कि राहुल जी ने अपने विपुल साहित्य का निर्माण बक्सर, हजारीबाग, देवली आदि कारावासों में ही किया । किसी को आद्योपांत समझने के लिए मुख्य रूपसे दो ही तरीके है--दूसरों के माध्यम उसे जाना, देखा, समझा जाए और दूसरी पद्धति यह है कि उसके ही माध्यम से उसे पहचाना जाए । राहल जी पहले की अपेक्षा दूसरे खाते म अधिक आते हैं । उनको समझने तथा जानने के लिए उनके अंदर प्रवेश करना आवश्यक है । 'दर्शन-दिग्दर्शन' की भूमिका में एक पंक्ति आई है--“अमरता? बहुत भारी भ्रम के सिवा और कुछ नहीं है ।'' एक बात लिखते हुए शायद वह उसे भूल गए थे कि भौतिक रूप से व्यक्ति मर जाता है लेकिन उसकी कृतियां उसे सदा के लिए अमर बना देती हैं । उनकी कोई भी कृति एक दूसरे से मेल नहीं खाती--कहां “बौद्ध दर्शन?' तो कहां चीन में कम्युनिस्ट ।' खूब लिखा उन्होंने । जो देखा, वह लिखा । जो भोगा, वह लिखा । जो अनुभव किया, वह लिखा । जीवन उनका दुर्गम था, लेखनी उनकी सहज थी । सोचिए जरा आज के साठ-सत्तर साल पहले एक भूला-भरका यात्री सत्रह सच्चो पर एक से अनेक पालि, संस्कृत, अर्द्धमागधी मे लिखी पौडलिपियां ओर पोथियां लिए. तिब्बत से चलकर कंदराओं, पर्वतों, घाटियों को लांघता हुआ, मौसम की परवाह किए बिना, कई दिनों तक बिना खाए, बिना नहाए अपने




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