पतझर एक भाव - कांति | Patjhar Ek Bhav Karanti

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Patjhar Ek Bhav Karanti by श्री सुमित्रानंदन पन्त - Sri Sumitranandan Pant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चद्रकला चेंद्रकला को उद्ति देख नीलाम गगन में जाने कंसा होने लगता, मेरे मन में ! 7 मुझे चांद से अधिक चॉद वी कला सुहानी उन घोमा-जंकुर में विधि की कला समानी 1 वह ने भुकुंटि, नख, असि ही, मने की नाव मनोहर प्राणों के मोहित सामर विर मुझे अनब्वर नागा के जग में पहुँचाती,-- जहाँ निरंतर न्वुलने दृग सम्मुख अमनिव्य जानंद दिगंतर नये जो न्हन्व-जग रथ ध्न्भ हद पतमकर : एक भाव क्रांति




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