अंतर्वीणा | Anatvani

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एक विचार :

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ओशो (मूल नाम रजनीश) (जन्मतः चंद्र मोहन जैन, ११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०), जिन्हें क्रमशः भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के प्रणेता-नेता थे। अपने संपूर्ण…

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२। धेयं साधना काप्राणहं प्रिय वहिन सत्य प्रत्येक क्षण, प्रत्येक घटना से प्रकट होता है। उसकी अभिव्यक्ति नित्य हो रही है । केवल देखने को आँख चाहिए, प्रकाश सदैव उपस्थित है । एक पौधा वर्ष भर पहिले रोपा था । अब उसमें फूट अने गुरू हुए है । एक वर्ष की प्रतीक्षा है तव कह्दीं फल है । ऐसा ही आत्मिक जीवन के संबंध में भी है । प्रार्थना करो भौर प्रतीक्षा करो--वीज वोओं और फूलों के आने की राह देखो । घर्य साघना का प्राण हैं कुछ भी समय के पूर्व नहीं हो सकता है । प्रत्येक विकास समय लेता है भर वे धन्य है जो धंय॑ से वाट जोह सकते आपका पत्र मिला है । आशा-निराणा के वीच मार्ग बनते चल रही है : यहू जानकर मन को बहुत सुनी होती है। जीवन-पथ बहुत टेढ़ा-मेढ़ा है । गौर यह अच्छा ही है । इससे पुरुपार्थ को चुनौती है और जीत का आनंद है । केवछ वे ही हारते ई जो चलते ही नही है । जो चल पड़ा है बह तो आधा जीत ही गया है। जो हारें बीच में आती है; वे हारें नही है । वे तो पृष्ठभूमि है जिसमें विजय पूरी तरह खिलकर उभरती है । रववर प्रतिक्षण साथ है, उसदिए गन्तव्य को पाना निध्चित है । में आनंद में हूँ । क्रांति प्रणाम भेज रही है । रजनीश्च के प्रणाम २८ माच, १९६३ [ प्रति : सुश्री जया शाह, बम्बर्ड ] १८




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