ज्योति - पुरुष | Jyoti Purush

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Jyoti Purush by रमेशचन्द्र - Ramesh Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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$ € छांतिस.य वहं -- सुनित्रानर्दन पन्त कहते, सूरज भ्रस्त हौ गया ! सूरज कभी न उदय-ग्रस्त होता प्रिय वच्चो, उसका उदय ग्रनन्त उदय है-- नए-नए ब्ररणोदय लाता वह्‌ भू-पथ पर, नई सुनहली किरण विचेर नए क्षितिजे! सूरज श्रस्त नहीं होता है ! महापुरुप भी कभी नहीं मरते त्रियं वच्चो मत्यु-द्वार कर पार अमर वन जाते हैं वह भ्रौर युगे तक जीवित रहते जन गण मन में ! मृत्यु गुहाके प्र॑धकारका हारपार कर भ्रगणित सूर्यो का यह कौन सूये हंसता श्रव ?- भारत के ग्राकाश दीप में !-- युग जीवन का नव प्रभात ला भू अगन पर्‌! उद्दित हुश्रा स्वातंत्यसुयनव स्वणिम किरणों का जगमग टंग गया चंदोवा नील मुक्ति पर ! वह श्रमरत्व भरो तन की रज वरस रहौ श्रव चिद्‌ अंब्रर से घरा घूलि पर-- गिरि शिखरों, सर-सरिताग्रों-सागर-लहरों से खेल रदी वह- लोट रही भू के खेतों में ध्न ~




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