मुद्रा एवं अधिकोषणा | Money And Banking

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Money And Banking  by एस० सी० मित्तल -S.C. Mittal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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^ मुद्रा एवं भघिकोपण जिएके पास दूसरे व्यक्ति की इच्छित वस्तु हो भर जिसे उसकी श्रनावश्यक वस्तु वी श्रावर्यकता हो । (३) विनिमय के क्षेत्र का संकुचित होना--यदि विनिमय का कत्र सीमित है (जैसे एक गाँव में ही श्रावइयकता की सब चस्तुएं बनाई जाती है), तो वर्तुप्रों की श्रदला-वदली करने के इच्छुक लोगों को यह ज्ञात करना सरल होता है कि कौन क्या वस्तु बनाता है श्रौर उसे किस वस्तु की श्रावदयक्तादै। यद्‌ जानकारी होने से बस्तु-विभिमय एक सरल कार्य वन जाता है । श्रावश्यकताम्रों के दोहरे संयोग के लिए बहुत नटी भटक्ना पड़ता । (3) सप्राज का पिद्ड़ा होना--पिछडे हुए समाजों में ही विनिमय के एक सर्व-स्वीवायं माध्यम (म्रात्‌ मुद्दा) का श्रमाव होता है । यदि यह होता भी है तो सोग इसके अधिक प्रयोग के ग्रादी नहीं होते, जिससे ये श्रपना वास वस्तु विनिमय के द्वारा ही पूरा किया करते हैं । लेकिन जब मुद्रा का चलन हो जाता है, तो इसी सहायता से विनिमय में बड़ी सरलता रहती है । फलतः लोग वस्तु विनिमय छोड़ वर मुद्ा-विनिमय करने लगते हैं । आधुनिक युग में वस्तु-विनिमय प्रथा का स्थान ऊपर जो कुछ भी कहा गया है उसमे यह नदी समभाना चाहिये कि वस्तु-विनि- मय प्रथा श्राज दुनियाँ से पूर्णतः मिट 'चुरी है । वास्तव में वस्तु-विनिमय प्रथा 'प्रय विश्व कै उन भागो में प्रचलित है जहाँ सम्यदा के सूर्य का प्रकाश ग्रभी नहीं फैला है, लोग सीधा-साधा जीवन व्यतीत करते हैं । उनकी झावश्यकताएँ थोड़ी हैं श्रौर श्रावा० गमन के साधनो ककम केः कारण विनिमय का क्षेत्र केवल गाँव की चहारदीवारी तक ही सीमित है । श्रतेक भारतीय गाँवों में श्रव भी नाई, कुरहार श्रादि को उनती सेवा के बदले में मुद्रा न देकर 'फमल के समय पर पैदावार मे से कुछ भाग दे दिया जाता है । स्वरोमान च श्रन्तदोने के वाद विश्व के विभिन्न देशों में भी वस्तु परि- बर्तन प्रया के झाधार पर ही व्यापार होने लगता है । जैंसे--ग्रमेरिका भारत से चीनी खरीदता है श्रौर बदले में मशीनें इत्यादि देता है। [हाल ही में भारत ने इग प्रकार कै श्रते दविपक्नीम व्परापरार पमभ्योते (87121621 1१302 7८01) विभिप्र देशों से बिये हैं] इसका कारण यह है कि एक देश की मुद्दा दूसरे देश में स्वीकार नहीं की जाती तथा स्वणुं जो कि सर स्थानों में स्वीकार किया. जाता है, केवल कुछ ही 1 के पास पर्याप्त मात्रा में है। ससार के देशों मे इसका बहुत श्रसमान वितरण हुप्रा है । परोक्षा प्रद (१) वस्तु-विनिमय प्रणाली के दोपों की व्याट्या कीजिये । मुद्रा दे प्रयोग से ये कंमे दूर हुये ? डी ही (२) “वस्तु परिवर्तेन प्रथा (84205) की परिभाषा कीजिए तथा इसकी झमुविधायों की समाइये । दब्य के प्रयोग द्वारा ये श्रमुविधाएँ कसे हृदाई जा सकती हैं ? करा बल्तू परिवर्तन प्रथा आन पु्त मिट डुदी है? ` ॥ ^) बस्तु विनिमय को संनव बनाने वावी दगाग्नौ का उत्नेष कीभिये। षपति म £ ट दप कर प्ट चप्त्तदौ 2 ४} निनिमयमेव्या श्रभिप्राय है? दृग्वेदो स्वल्प कौन-कौन वस्तु विनिमय से कया लाग हैं ? (+:




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