श्री गोविन्द लीला मृतम् | Shri Govind Leela Mritam
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
13 MB
कुल पष्ठ :
391
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand){ १२ श्रीगो चिन्दलीलाखतम |
पुल्ाभिमधतीभिवेकहर ! विलसन्व्यत्र फुल्ला रसालाः
सन्भल्लौभिः शिसीषास्त्विह बरगशणिका-वीथिभिख्ात्र सौपा: ।
जातीभिः सप्तपर्ण इद च ऊुसुमिताम्लान-पालीभिरस्मिन्
लोध्रास्ते वां सपय्यीर्थिन इद एलिनी-श्र णिभिः इन्द मेदाः ।४६॥
खङ्गः कापि दनप्रियः कचिदिमे चार्य धुस्याटकेा
दात्यूहैः शिखि-चाठ्कास्त॒त इतो हंसाद्यः सारसः ।
कीराः कापि किखोक्ुलीरिह भरद्वाजैग् हारौतका
रायन्तीव युदत्र वां गुण-यशः प्रमृखा रुम्वत्तः सद्ा ॥४५
शासखैका सुकृैयु ता क्िशलयैरन्या प्रसूनैः परा-
प्येकस्येह तराहरिद्धिरपरा काचिहलैः पाण्डुरे
रव बसन्तादि ऋतशझों में दम्पति-भाव को ग्राम
लता व॒बक्षणण की बिशिष्ट शोभा को बर्णन कहते हैं यथा
हे औकृप्ण ! इस वुन्दाटवी में विकसित माघवी - लताओं के
साथ प्रफुल्लित रसालवन्द, सुन्दर मल्लिकाओओं के साथ शिरीष
समूह, यूयिकाओं के साथ कदस्ब समुदाय; जाति - लताश्मीं
के साथ सप्रपणे समूद, कुसुमित व अम्लान पाली-(पंक्तियों) के
साथ लोघ के चूक तथा फलबती प्रियंगु लताओं के साथ कुन्द-
गण मिलित होकर तम दोनों की पूजा के लिये बिशेष शोभा
को प्राप्त हो रहें हैं ॥।४६॥। ं
इस बृन्दाटवी में किसी स्थान में भौंरों के साथ कोयलों
का समूहः, कदं स्वेणं ~ चातक ~ पक्षिया के साथ युड़शुड़, कही
डाहुक पक्षियों के साथ मोर व चातकों का झुण्ड. सारस सपु-
दाय के साथ शुकभ णी, तथा मरद्वाज पश्चियों के साथ
हारोत पश्चीकुत बड़े आनन्द के साथ प्रेम विवश होकर मानों
तोश्चाप दोनोंके गुणव यशका ही कठेन कर रहे हैं ।(४५॥
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