कृष्ण - काव्य में सौन्दर्य - बोध एवं रसानुमूर्ति | Krishn - Kavya Men Saundarya - Bodh Avm Rasanubhuti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(0) घा कै जाभूणण -शिरीमूणण--सांम को मौतीञश्ीरफूट+ गए ईदी चद्धिका,गेना+ नासिका कै णण नासासुक्ता त्वेस ,नथ,लवंग; कान के आमुषण- ताटंक, कुंद्ल ,चुिला ,छुमी , तस्थोना ,कर्णफ़ूल, फकुमका;कठ जार हृदय-प्रदेश के आमुषण-- कठश्री ,हार ,पाठासं,चाँकी आदि; हाथ के आभू ग -- वलय, कंकणा १ना ङुबंद +ड , पहुँची , नवगरष्ठी सुद्ध +कर-पान आदि; कटिके आआमृशण किंकिणि $काची पद कै जामूणण- पैजनी ,पाय्छ, चैट अनूपुर + जिया ,पदपान्‌। (ल) प्राकृतिक सोदर्य वृन्दावन --( १) पुलिन , नि कुन (२) कृतु-साँदर्य :बसत बं शद (ग) कला त्मक सौंदर्य : नगर गुहसज्जा पव दितीय खण्ड : रसामुमुत्ति -ग-ष्ठ परिन्देद : -स के उपकण [९-२५५-८5 | जनाना 8 ।फ रख्श्प : वाया कृष्ण (२) सिक : कृष्ण या राधा (3, रा रख | (४) लीछारस के उपकरण : घाम, परिकर, मनवचत्व (५) लीलाएड ~~ व्रलरस+नित्यकिहा१-ःस्‌ ¦ (€) लीला सच्सम पा न्व टीला सख्यौ मत [2. 3>--339|




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