जीवन - कण | Jivan - Kan

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Jivan - Kan by कृपाशंकर त्रिपाठी - Kripashankar Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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का प्रबंध में बाघा ढाल कर श्रपने लिए टिकिट खरीदने की कुदत्ति पर पके इठ समय ग्लानि हुई । श्रौर शत्रुध्नजी, नए रेगरूट ! क्यो न चद भी मेरी तरह श्रोवरच्रिज के नीचे श्राषा षया टदल कर स्टेशन-मार्टर के कमरे तक एक चक्कर लगा श्राए ? जी में हुश्ना किं श्रपनी कायरता के प्रतीक उप्र टिकिट को टुकड़-इकड़े कर परों-तले खूब कुचल , खूब कुचल | पर देर हो रही थी । शर्माजी ने सब बयान सुना श्रौर सुक्े टीन के मुखाफिर- खाने में छोड़ कर स्टेशन जाने को उयत हुए। मगर मैंने साफ़ छट दिया, “भई, श्रव तुम श्राघा घंटा लगाओगे । मुम ष तरह का इन्तजार पसन्द नदी ! मेरे पाह टिकट हे, में मी चलता हूँ ।”” “टिकट दे १ श्ररे, तब तो काम बन गया | ला, टिकट सु दे ।”” श्रीर्‌ म ११ “श्रपने लिए प्लेटक्रा्म-टिकट खरीद ले 1 मेने टिकिर शर्माजी के खौप कर, उनके सामने दी, टिकट खरीदने श्रौर टिकिट रोक रखने की श्रपनी दो-दो जुद्धिमानियों को जी खोल कर बधाई दी । दिल में घुपचाप सोन लिया कि श्रादेश में काम कर बैठना-मले दी बह टिकर को फाड़ डालने का दी काम हो-श्रच्छा नहीं होना । श्रौर उसी खमय दो घुद्धिमानियाँ, खुद-व-खुद, श्रौर कर ढालीं । श्रर्षात्‌, एक के बजाय दो प्लेटफार्म-टिकिटः खरीद लिए)




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