श्री शिवमहापुराण | Shri ShivmahaPuran

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चित्रसूची बहुरंगे १-उमा-मद्देश्वर दम . मुख २-भगवान्‌ दिव ध्यानस्थ रु -श्रीदिव-पार्वती दर रे -श्रीनारायणके नाभिकमलसे ब्रह्माजीका प्रकट होना ७२ ५-तपस्विनी . सतीके सामने दिवका प्राकस्य १०८ ६-उमासहित भगवान गृत्युज्ञय १५८ ७-वस्वेषमें भगवान्‌ दिवं १६७ ८-तपस्यामयी पावंती १९६ ९-पार्वती और सततर्षि १९६ १०-दिवकी विकट बरात २२० ११-भगवती पावंती-विवाहश्डज्ञार २२५ १२-भगवान गणेशजी २५३ १३-गुफामें गौरीशकर २८१ १४-श्रीशिव-पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान ३९६ १५-मभगवान्‌ स्कन्द नी ४२७ १६-पार्वतीकी काली त्वचाके आवरणसे कोदिकीका प्राकस्य ७१ १७-उपमन्यु और श्रीकृष्ण पुर रेख। चित्र दोरगा श-उमा-मद्देश्वर.. ऊपरी मुखप्रष्ठ इकरंगे चित्र श्-नारख्जीकी काम-विजय ७६ र-नारदजीके द्वारा सुन्दर रूपकी सौँग.... ७६ रे-खयंवरमें वानर-मुख नारद ७७ ४-नारदजीके द्वारा भगवान्‌ विष्णुको शाप . ७७ ५-भगवान्‌ रामको दिवजीके द्वारा नमस्कार १३६ ६-राम-परीक्षाके लिये सतीका सीतारूप धारण १३६ ७-दक्षपर सतीका क्रोध श४८ ८-सतीका योगायिसे झरीर-त्याग श४८ _ ९-शिवजीके द्वारा दक्षके वकरेका सिर लगाना १६४ १०-तपस्थामयी पावंतीके साथ घुद्ध ब्राझमणके रुपसें शिवकी चातचीत २०० ११-दादद ज्योतिर्छिज्-१ ३३८ १९-द्ाइश ज्योतिरलिड्न-२ दुडए रोन्- रेखा-चित्र -लिज्नस्थित भगवान्‌ शिव २-दौनकजीको सूतजीका दिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना ३२-यमपुरीमें गये देवराज ब्राह्मणको विमानपर बिठाकर शिवदू्तोंका कैठास जानेके लिये उद्यत होना तथा धर्मराजका अपने भवनसे बाहर निकलकर उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना कस थ नगद ४-वाष्कलनगर निवासिनी चब्चुलाका गोकर्णक्षेत्रमें शिवकथा बौँचनेवाले एक पौराणिक घ्राह्मणसे अपना उद्धार करनेकी बात करना प-चब्चुलाका दिवपुराण सुनमेके परिणामस्वरूप शिवद्वारा भेजे गये विमानपर आरूढ़ होकर शिवलोकमें आगमन तथा पावंतीका उसे अपनी सखी स्वीकार करना ६-पार्वतीदेवीका चन्चुलाके साथ जाफक़र उसके पति पिदाचयोनिवाले बिन्दुगको शिवपुराणकी कथा सुनानेका गन्धर्व॑राज तुम्बुरुको आदेश ७-चब्चुलाके साथ... विंध्यपबवंतपर. जाकर गन्घवेराज तुम्बुरुका बिन्दुग पिदयाचकों पादशों- द्वारा बाँधना तथा हाथमें वीणा लेकर गोरी- पतिकी कथाका गान आरम्भ करना ८-सरस्वती नदीके तटपर तपस्यारत व्यासदेवको सनत्कुमारका सत्यवस्तु--भगवान्‌ दथिवके चिन्तनका आदेदडा देना -मद्देश्वरका श्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कछ और सकल स्वरूपका परिचय देना तथा दोनोंके मध्यम भीषण अग्निस्तम्भके रूपमें उनका आविर्भाव . सर १०-हिमाल्य पव॑तकी एक शुफामें नारदजीकी तपस्या पे ११-नारदलीका अपनी काम-विजयका घ्रत्तान्त विष्णुसे कहनेके लिये विप्णुलोकर्म आगमन . १र-विष्णुद्वारा मायानिर्मित नगरमें राजा दीलनिधिका नारदको रत्नसिंदासनपर विठाकर उनका पूजन करना तथा . अपनी कन्या मुखपृष्ठ १७ १९ २० र्र्‌ रा रद ३० देर ७३ छोड




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