उलटवाँसी-साहित्य | Ulatvansi Sahitya

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Ulatvansi Sahitya by रमेश चन्द्र मिश्र - Ramesh Chandra Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“निरंजनी सम्प्रदाय श्रौर सन्त तुरसीदास सनिरंजनी' ; डॉ० घिलोकी नारायण दी क्षित--'हिन्दी- सन्त-साहित्य' (शोध प्रबन्ध); डँ प्रेमनारायण थुक्ल--'सन्त-साहित्य' (शोध-प्रवन्घ ) ; ङ?० सरनाससिह शर्मा कवी र-एक विवेचन ; डौ ० श्रोम्प्रकाल--“हिन्दी-काव्य ओर उसका सौन्दर्य' (शोध-प्रवत्च ) ; डॉ० गोविन्द ब्रिगुणखायत - 'कवीर की विचार-वारा' (शोध- प्रबन्ध ) ; डॉ० रामधन दार्मा --'कुट-काव्य-एक श्रघ्ययनः (झोध-प्रवन्ध ) ; प्रो० झार० डी ० रानाडे--'पाथ वेट गौड इन हिन्दी लिटरेचर' श्रादि विद्धान्‌ ओर उनके विवेचनात्मक कायं । उक्त श्रालीचना ग्रन्थों में *उलटरवाँसी' का विवेचन प्रासांगिक रूप में होने के कारण स्रल्प ही है । आचायें रामचन्द्र शुक्ल; डां० द्यामसुन्दर दास; डॉ० चघोरेन्द्र वर्मा; डॉ० रांमकुमार वर्मा; श्राचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री झयोध्यासिह उपाध्याय “हरिश्नौघ' तथा श्री विइ्वनाथ प्रसाद सिश्र झ्रादि प्रतिष्ठित विद्वानों ने ऐतिहासिक प्रसंग में नाम रूपान्तर से 'उलटवाँसी' की चर्चा की है । इसी प्रकार से हिन्दी के कोश ग्रन्थ उलटवाँसी का संस्पर्यों करते हैं । बक्रनोक्ति दौली का विवेचन करते हुए झाचाये नगेन््र मे सन्तों की 'उलटीः श्रौर सीवीः दोनों वाशियों में काव्य-दास्त्रीय व्यंग्य एवं वक्ता के झध्ययन का संकेत दिया है । उपयुक्त वर्णन से यह्‌ स्पष्ट है कि उलटवाँसी शैली का श्रभी तक स तो विस्तृत अध्ययन हुआ था भौर न इसके काव्य-सौन्दर्य को परखने की पर्याप्त चेण्टा ही किसी चिद्वानु ने की है! इसमे सन्देह नहीं कि इस शैली का चमत्कार-सौन्दर्य झरालोचकों का ध्यान श्राङृष्ट किये विना नहीं रह सका है । पर, उलटवाँसी' की समग्रत्ता की दृष्टि से झालोचकों का प्रयत्न, करवीर श्रथवा किसी अन्य सन्त की विवेचना के प्रसंग में ही, एक विज्ञेष सीमा 1 है । उलटवाँसी झैली की व्यवस्था, स्वतन्त्र रूप से विवेचन के श्रमाव में न हो सकी थी | प्रस्तुत दोघ-श्रवन्ध उसी दिशा में एक विशेष प्रयत्न है 1 प्रस्तुत शोघ-प्रवन्ध सात अ्रध्यायों में व्यवस्थित है । यदि इस प्रवन्घ के प्रथम अध्याय को शरीर कहा जाय तो चतुर्थ अध्याय को इसका प्राण कह सकते हैं । शेप प्रध्याय वस्त्र के रूप में झरीर रूप प्रथम भ्रघ्याय की ही साज सज्जा करते हैं । इस श्रध्याय के विपय- प्रवेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि विचार अथवा भाव की अभिव्यक्ति केलिए उलटर्वासी यौली की शझ्रावदयकता क्यों हुई ? साघनात्मक शझ्रनुभूति की सुकष्मता के कारण वाणी को, ऋजु-मागे का परित्याग करके, वक्र-मार्यं का सहारा लेना पड़ता है । इसी श्रव्यायमें यहुभी रपष्ट कर दिया गया हैं कि इस दीली के प्रयोक्ता सन्तो ने “उलटरर्वाँसी' शब्द करा प्रयोग न करते हुए भी इस दाव्द के समानार्थी 'उलटावेद', 'उलटीवात', “उलटा ष्याल', 'उलटावती', 'उल्दामती' आदि शब्दों का प्रयोग किया है । 'उलटर्वसिी' शब्दं का प्रयोग वीसवीं शताब्दी की देन प्रतीत होता है जो अपने विषय एवं कथन की विशेष पद्धति केलिए सन्त-परम्परा में श्रथवा श्रालोचकों के द्वारा प्रचलित हो गया होगा । इसी अध्याय में उलटर्वासी शैली का स्वरूप निर्धारित करते हुए जो अ्रनिवाययं तत्त्व निदिचत्त कयि हवे ्रनेक प्रकार के अवरोधक प्रदनों, शंकाग्नो के समाधान के परिणाम हैं । ये तत्व श्रीर इस दौली की सामान्य विदेपत्ताएं भ्रार




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