जैन धर्मामृत | Jain Dhhrmamrit

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Jain Dhhrmamrit by प. हीरालाल शास्त्री - Pt. Heeralal Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अन्य और ग्रन्यकार-परिचय १७ उपयुक्त ठनो अन्थोक्त प्रकाशन उनके दहन्दी श्रनुवादके साथ अनेक सस्थाओते हो चुका ह । समयसार कलशका प्रकाशन पं० राजमल्च्की प्राचीन दिन्दी वचनिक्रके साथ व्रहुत पने व्र° शीतल प्रसादजीके द्वारा सम्पादित ट्रोकर जैन विजय प्रिटिग प्रेस सूरतसे हुआ है और जा उस नमय जेनमिनकर ब्रादकोका उपहार स्वरूप भी मेट किया गया था । हमने जेन धर्मायृतम उक्त दोना त्रन्थाा उपयोग सनातन श्रन्थमालाके सप्तम ८. असितगति और सं० पंचसंग्रह, अमितगति-श्रावकाचार प्राकन पंचसग्रदकों श्राधार बनाकर उसे पल्लवित करते हुए श्रा० अभितगनिने श्रपने सरद्रत पंचसग्रदकी रचना की है । मूलग्रत्थके समान दन अन्थमे भी उन्न नामवान पोच श्रव्याव हैं, जिनमेंते प्रथम भध्यायमे २० प्रत्पणाग्रो दाय जीवक श्र शेष श्रव्यायोम कर्मक विविध ग्रवत्यान्रोा चोढद्‌ मारणार दाग वर्णन किया गया है । उन यथ्यायेनन नाम रौर उनकी श्टक-संख्या इस प्रकर है-- 2 १. जीवममास शलाक सख्या ३५३ २, प्रकृतित्तव 1 ४८ ३, वन्वरस्तव ध १०६ ४ शनक ३ २३७५ ५. सप्ततिका 9 ४८४ उक्त इलाक-सख्याके श्रतिरिक्त पॉचो दी श्रध्यायोमें लगभग ५०० श्लाक-प्रमाण गद्य भाग भी दे और बीच-बीचमें मूलके श्रथको स्पट्ट करने- वाली अनेकों श्रंक-संडट्रियोँ भी हे । इस ग्रन्थते जैनधर्मागतके दूसरे, छठे, सातय, श्रौर दसवें श्रध्यायम गुणस्थानाके स्वरूपवाले २३ श्लोक संग्रहीत किये गये हद | ता० अमितगतिने एक श्रावकाचार भी रचा है, जो उनके नामपर




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