ऋषि सम्प्रदाय का इतिहास भाग 2 | Hrishi Sampraday Ka Itihas Vol. - Ii

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्र पपिऋषि-सम्प्रदाय का इतिहास युवं -पीठिकानिष्पक्ष और उदार भावना से जैनघ्म श्र इतर धर्मों के स्वरूप के महत्त्वपूर्ण अन्तर को समक लिया जाय तो जेनधघर्म की अनादिता को समभे मे कोद कठिना नहीं हो सकती । जैनधर्म कोई पंथ या मत नहीं है चौरन वह इतर धर्मों की भांति किसी च्यक्ति या पुस्तक पर निर है । बेदधमं के छानुयायी सानते है-- 'नोदनालक्षणो धमेः ।› अथात्‌ वेद्‌ नामक पुस्तकों से प्राप्त होने वाली प्रेरणां ही धमं है । यह्‌ वैदिक धमं है । इस व्याख्या से स्पष्ट है कि वैदिक धमं वेद्‌ के अस्तित्व पर जीनित दै । जव वेद्‌ नही थे तो वैदिक ध्मभोनदींथा। वेद्‌ के गद्‌ इस धमंकाप्रादुर्भाव हुआ । इसी प्रकार वौद्ध धमं का महात्मा गौतमबुद्ध से प्रादुर्भावहै ७ € हरहुआ है । उनसे पदले बौद्धघ्म के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है ।




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