हिंदी विश्वकोष - भाग 5 | Hindi Bishwakosh Bhag - 5

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Hindi Bishwakosh Bhag - 5  by नगेन्द्रनाथ बसु - Nagendranath Basu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्र त्वमोष ४ मारने पर भी वद उम्नसे निवुस नही' होता । पेसा | आग्रह वा हट पूर्वजन्मका संस्कार वा अभ्यास छोड़ कर और कुछ भी नही है । ६। जीवविशेषकरा खमाव ओर क्र्मविरशेष पूवं. | जन्मको अवस्थिति साबित करता है । सयःप्रसूत माखा- । सुगकी शाखाका आक्रमण और सच्यःप्रसूत गण्डार-शिशु- का पलायन-वुत्तान्त अच्छी तरह जाननेसे मालूम पड़ गा पूलंजन्म है, इसमे कुछ सन्दे हं नही । इत्यादि । जो कदते है, कि पूर्लाजन्म नहीं हे, उनका मन नितान्त अश्रदु्पेय और युक्तिविगहित है । ज्म, मरण ओर जीवन--आरप्रा जव अजर अपर है, तब मरना कौन है १ इस प्रष्नकौ मीमांसा करनेमें पक साथ ` जन्म, मरण आर जीवन तीर्नोक्रा ही वणेन ओर मीमांसा आा जाती है । ऋषिपावका कहना है, कि 'नाय'हन्ति न | इन्पते' आत्मा न किसोको मारती है और न स्वयं मरती | । | | ही रै । कारण, मरण नामक कोई स्वतन्त्र पदाथ नहीं है । जो घटना मरण कहलाती है उसके प्रति लक्ष्य करनेसे, सूश्पानुसूच्मरूप विवेकबुद्धिको परिचालना करनेसे समभमें आ जायगा, कि कौन मरता है। मरण क्या है, । पहले यही जानना आवश्यक है । कुछ घास, लकड़ी | ओर शख्स ठे कर पक्र अपयवी (गृहादि) षनाया । जल, | | वायु ओर श्ृत्तिका आहारण करके फक दसरा भवयवी । ( धरादि ) प्रस्तुत क्रिया । क्षिति, जक ओर वीज पक | साथ मिल गया, उससे अ'कुर निकला, उससे शाखा- पल्वादि उत्पन्न हण | भव वह कहने लगा, कि वृश्च उत्पन्न हुआ रै । कुर दिन घाद्‌ उन स्वोंका वह पूं अवयव विशिल््र हुआ अथवा यों किये, छि उन सव | अवयर्वोका संयोग विध्वस्त हुआ । अव उसने कटा, कि गृह भग्न हो गया, घट विध्वस्त हुआ भौर वुक्ष मरं गया | है। सोच कर देखो, फिस प्रकार घटनाके ऊपर भग्न, | ध्वस्त और मरण शब्द का व्यवहार हुआ है। अवयवका शैथिल्य, विकार अथवा संयोग 'ध्वंस इस अन्यतमके न ऊपर ही मरणादि शब्द प्रयुक्त हुए थे । ' उसे निजी व न पदार्थसे सजीव पदाथमें उठा कर लानेसे समभमें आयेगा, कि जीवन्त पदा्थका मरण कौन है ? जन्म मरण भीर | कुछ भी नहीं है, अवयवका अपू्व॑ संयोगभाव जन्म और | ४०1, ॐ‡*. 3 उसका वियोगभाव मरण है । ्ल्युरत्य नविस्पछृनिः' मरण ओर आत्यन्तिक विस्मरण दोनो पक्र ही बात है । जिस कारण कटने जीवक्रो दैहपिज्जर्मे आवत रखा धा, उसी कारण कुट वा संयोराविशेषके विनष्ट होनेसे अत्यन्त विषश्मरण वा प्रहाविष्मरण नामक्र मरण होता है । मरण होनेसे देहादिमें अन्य प्रकारका विकार उपस्थित होता है । अतपव सभी अवयवोंके अपूय संयोगका नाम जन्म ओर वियोग विशेषका नाम मरणरहै! इसीसे सांख्याचायने कहा टै -- “अपृवदेहेन्दरियादिसश्रातचिशेचेण संयोगश्च चिगरोगश्च ।” | ( सांख्य ) इससे मालूम होतादहै, कि सावयव घस्तुषया हो मरण होता है, निरवयव वस्तका नहीं । आत्मा निरवयव ह हमीसे आत्माक्ा मरण नहीं है। नितान्त सूक्ष्म . और निरवयव दृन्द्रियोकी भी मृत्यु नहीं है । आत्मा नहीं मरती और न इन्द्रियं ही मरती है, यह सिद्धान्त यदि सत्य हो, तो अमुक मरा है, में मरू गा, में मरा, ऐसा न कह फर देह मरी है, देह मरेगी ऐसा दो कहना उचित है, पर ऐसा जो कोई भी नहीं' कहता रै, उखका कारण क्या १ कारण है । मनुष्य इस द्रश्यमान संघातका भर्थानु देद्‌, इन्द्रिय, प्राण, मन इनके सम्मिलिन भावका विनाण देखकर ही भरण णब्दका प्रयोग करते रै । यथार्थे प्राण संयोग- का ध्यंस ही उक्त णष्डका प्रधान लक्षा दहै | प्राणन्यापारके निवुत्त नही होनेसे दुसरेके सम्बन्ध- कौ निवृत्ति नहीं होती । जीघन' 'मरण' इन दो शब्द- के धातव अर्भका अन्धेप्रण करने पर भी कथित अथं प्रतीत होता है । जीव धातुसे जीवन और सु-घातुसे प्रण, जीव धातुका अधं प्राणधार्ण अर मु-धातुका अर्थं प्राणपरिस्याग है। सुतरां यह मालूम होता है, कि प्राण जब तक देहेन्द्रिय संघातमें मिलित रहते हैं, तभी तक उसका जीवन है, विच्छेद होनेसे हो मरण होता है। अतः यह कहना होगा, कि मरणसे आत्माका विनाश नहीं होता, देहके साथ उसका केवल विच्छेद होता हे । मैं मरा भौर अमुक मरा, इन सब शब्दोंका अर्था औपयारिक है। आत्माका अध्यास रहनेसे ही देहादि-संघात मह~




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