नानेश वाणी 8 | Nanesh Vani 8

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Nanesh Vani 8 by तेजराज जी नंगावत - Tejraj Ji Nangawat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परदे के उस पार / 5 दूध गरम करने वाले व्यक्ति को देखा होगा। उसकी पहचान यह है कि जब भाप बाहर निकलती है तो वह समझ लेता है कि दूध गरम हो गया- उफान आता है तो पानी के छीटे डालकर उफान को नीचे বন্তা ইলা है। वही परिस्थिति आपके मन रूपी बर्तन की है। पाप सबसे पहले आत्मा के द्वारा मन मे पैदा होता है और जब भावना मे तीव्रता आती है तो वह उसे वाणी से कहने लग जाता है, फिर वाणी तक ही सीमित नही रहता। इतना मन मे पक्का विचार हो गया कि मुडे तो शत्रु को खत्म कर देना है, तब वह काया मे परिणत हो जाता हे। पाप का फल पाप करने से पहले भी मिल सकता है और पाप करने के बाद भविष्य मे भी मिल सकता है ओर भविष्य मे कृष साल वाद या भवान्तर मे भी मिल सकता हे। दुश्मन को खत्म करने की भावना तीव्र हुई ओर वह दुश्मन को मारने के लिये पर्हुचता है। उस वक्त उस दुश्मन को भी साकेतिक रूप से ज्ञात हो जाता है कि यह भाई मुञ्चे मारने के लिये आ रहा है। एक-दूसरे की भावना एक-दूसरे को ज्ञात हो सकती है, यदि व्यक्ति सवेदनशील है तो यन्त्र की आवश्यकता नहीं रहती । टेलीपेथी के अनुसार एक दूसरे के भाव इतने द्रुतगति से जाते है कि उन भावो को रोक नही सकते। अत किसी पर भी बुरे विचार करने से पहले वेचारिक सम्प्रेषण पर विचार कर लेना आवश्यक है। सूर्य की किरणो की गति का नाप वैज्ञानिको ने लिया है। ये किरणे प्रति सेकेण्ड मे एक लाख छियासी हजार मील की दूरी पार करती हैं, लेकिन विचारो की गति, किरणो की गति से भी अधिक या तीव्र या तेज है। दूषित विचारों का परिणाम अच्छे विचारो का प्रवाह भी बाहर जाता है तो बुरे विचारो का भी प्रवाह बाहर जाता है। कोई मनुष्य किसी पर घातक वार करने




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