श्री ज्ञान थोकड़ा संग्रह भाग -4 | Shri Gyan Thokda Sangrah Bhag-4
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
224
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ग]
सयुं पांचो पद् समरता,
मिभ्या तिमिर् पुलाय ५६॥
शुद्ध उपदेशुक शुद्ध गुरु,
सेव्यां उपजे ज्ञान ॥
पत्थरकी प्रतिमा करे,
गुरु कारीगर जान ॥ ७ ॥
ज्यूं साधु संगति थकी,
शुद्धरे आतम ज्योत ॥
अनुभव दीपक हाथमे,
निज घर होव उद्योत ॥ ८ ॥
भारी करमी जोव को,
धर्मं वचन न सुहाय ॥
ज्यं ज्वर व्यापित देहे,
के अरुची अन्नकी धाय ॥६॥
तिम मिष्या ज्वर जोर से,
न हले अनुभव ज्ञान ॥
विपय कपाय मिथ्यात थी, ।
होय सुमत की हान ॥ १० ॥
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