शिवराजभूषण | Shivarajabhushan

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Shivarajabhushan  by परमानन्द सुहाने - Parmanand Sunahe

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शप्राजमूपषण। (५ मो ১ নিত শপ ^ खादय । पदक पररारथ मारथ जसे जगाय कः व साधा ॥ कवल ॥ 546) दरबारवि- ललाने बरादार दाख जापता करनहार नेकह' ऋ ৯৬ সি ने भनक। सपरामनत मापलाक आग आइ ৫ वाजं भये उमरायं जन तजक करनके ॥ साहि रह्यी जाके शिवसाहिरखो तकि आर चाहिरह्यो वाकं वनं व्यत खनवनके । भरीषमका भाचसां खमानका प्रताप देखि हरे समतारे শা শনি পল্লি ও. 1 अनन्वववरंन दोहा |} जहा करत उप. भयम उपमय उपमान । ताह श्चनन्पे ক্লক লুনা অঙ্গ লাল ६ ॥ उदादर्स स्वे ॥ साहि तने सरजा तुब ढार प्रतीदिन दान कि दुद॒मि बाज । भूषण [भिक्षुक भरनको अति भोजहृते टि माजन साजं ॥ रावणकी गनराजनि को नसाहिनम नाहं या इविश्नाजे । खाज गरीब. निवाज मह ० तांसा तहा।शवराज নিহাল ও ॥। पत्र्णन दोटा ॥ অই प्रसिद्ध उपमानकोी कवे व- रणत उपमेय । तहँ प्रतीप उपमःकहत भषण जाय अंसय ८ || उदादरण অনা 12 জন্তী (तितही आतेही छवि क्षीराथे रंग करारी । मषण शुद्ध सुधानके सोबनि सोचत सीघरिं ओप उ-




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