दिवाकर दिव्य ज्योति भाग - 19 | Divakar divya jyoti Bhag - 19

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Divakar divya jyoti Bhag - 19 by श्री शौभाचन्द्र जी - Shri Shaubhachandra Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अखसत्यं परिहार ] [ ५. ৪, हैं कि ढससे पहले की बात का विरोध द्वो जाता है। उत्तकी बातों में श्रसंगति होती हे.। मगर स्वज्ञ की वाणी में यहे दोष तनिकः भी नहीं होता | (१८) शिष्टता-भगवान्‌ की वाणी अत्यन्त शिष्टतापुर्ण होती है। उससे उनकी ऐसी लोकोत्तर शिष्टता सूचित होती है कि जिसकी तुलना नहीं हो सकती । (११) असंद्ग्पिता-- भगवान्‌ जिस बिषयः की. प्ररुपणा करते हैं, उसे इतनी स्पष्टता के साथ' समभाते हैं कि श्रोतार्थो को, सदेह नदद रह्‌ जाता | 7 ^ व (१२) भगवान्‌ के वचन निर्दोष होते हैं. और साथ হী इतने विशद्‌ कि शक्का समाधान के लिए. गुं जाइश हो. नहीं रह्‌ जाती। ` | (१३) हृदयग्नाहिता प्रतिपाध विषय फो भगवान्‌ दस शैली से प्ंतिपाइन करते हैं कि श्रोताओं का मंन सद्दज'दी अंकर्षिंत हो जाता है और कठिन विषय भी सरलता, से सम मे श्रां जाता है । भ्न (१४) देशक्लानुरुपता “= मूल तत्त्व यद्यपि शाश्वत होते हैं अर समय के परिवर्तन के साथ उनमें कोई परिवत्तेतः नहीं . हो: सकता; वधापि/उनकाःनिरूेपण देश शीरं फाल कोष्ट मे रखकर किया जाय तो;सुंगमठ होती।है. ॥४ भगवान कीःवाणी में यदह गुण सी होता है। 17 „र फट, 7 5 কাটি ও লাগাও ˆ ए (१४) तर्वासुरूप->देश:काल का” अनुसरण करने पर भी.तत्तव के स्वरुप: के अअनुरुप द्वी' भगवान/ःका उपदेश होतां है ।८




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