नाटय - सप्तक १ | Natya Saptak 1

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
शेयर जरूर करें
Natya Saptak 1 by रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakurरामपूजन तिवारी - Rampujan Tiwari

एक विचार :

एक विचार :

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur

रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

रामपूजन तिवारी - Rampujan Tiwari

रामपूजन तिवारी - Rampujan Tiwari के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
( १७ )का अपना एक स्थान है। (४772 नाम से अग्रेजी में अनूदित हो कर इस काव्य ने लोकप्रियता प्राप्त की है। वह शायद इसी कारण । विदेशी पाठकगण भारतीय कवि की लेखनी की पौराणिक नारी को देखने की आशा से आ कर आधुनिक नारी को देख कर विस्मित हो गए हे ।चिरकुमार-सभा (१९००-१९०१)आरम्भ से ही इस पुस्तक का प्रचलन 'चिरकुमार-सभा' तथा श्रजापतिर निर्वन्ध' इन दो नामो से होता रहा है। इस प्रहसन की रचना सबसे पहले सलाप- बहुल उपन्यास के आकार में की गई थी । बाद में अर्थात्‌ १९२५ के समय पेशेवर रगमच के आग्रह पर कवि ने इसको सपूर्ण नाटक के आकार में बदल दिया--- और तब पेशेवर रगमच प्र अभिनीत हौ कर नाटक ने प्रभूत लोकप्रियता अजित की । यथार्थत इसी को रवीन्द्रनाथ के नाटक का प्रथम मञ्च-साफल्य कहा जा सकता है । दीधेकाल तक निरन्तर इसका अभिनय चरता रहा । उसके वाद भी जव कभी इसका अभिनय हुमा, देको का अभाव नही रहा । शौकिया नाटक मण्डलियाँ तो अब भी अवसर मिलते ही इस प्रहसन का अभिनय करती ह्‌ । इस लोकप्रियता का क्या कारण है? प्रथम कारण हे नाटकं की मूल घटना का रसपूणे सहज सप्रेषण । आददवादी नवयुवको के एक दल ने देहा तथा समाज को उन्नत बनाने कौ इच्छा से चिरकूमार रहने की मनोकामना प्रकट की है--और चुपके चुपके चिरकुमार-सभा का एक भूतपूर्व सदस्य--जो अब स्वय विवाहित है तथा अपनी दो अविवाहित सालियो की शादी के विषय में उद्विग्न है, उनका ध्यानभग करने का आयोजन कर रहा है। दर्शक के चित्त में इस प्रकार की घटना का सप्रेषण जेसा सहज है उसी प्रकार व्यापक भी है। दूसरा कारण, चिरकुमार-सभा के प्रवीण सभापति चन्द्रमाधव बाबू, उक्त सभा के भूतपूर्व सदस्य अक्षय और उसके श्वशुराल्य के दूर सम्पर्कीय सबधी रसिक प्रभृति सजीव पात्र हं । तीसरा कारण है--सलप की असि-क्रीडा। चतुर्थे कारण--हास्यरस तथा रेप का मुहुमुहु स्फुलिग-वषेण, तथा पचम कारण है-- नाटक में प्रयुक्त रवीन्द्र सगीत का इन्द्रजाल । वंगला साहित्य मे प्रहसनो का अभाव नही है । किन्तु सव ओर से विचार करने पर चिरकूमार-सभा' को सर्वोच्च मासन पर स्थान देना पडता है । रुचि की स्थूलता, घटना की अशालीनता, सलाप का अमाजित रूप आदि बहुधा प्रहसन के दोष वन जाते हं । “चिरकुमार-सभा' इन सभी दोषो से मुक्त है--ओौर इसके




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :